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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 19
वरेण्य उवाच- द्विविधोऽपि हि योगोऽयमसंभाव्यो हि मे मतः । यतोऽन्तःकरणं दुष्टं चञ्चलं दुर्ग्रहं विभो ॥
वरेण्य बोले - हे भगवन्! इन दोनों प्रकार के योगों को मैं महाकठिन देखता हूँ, कारण कि मन बड़ा दुष्ट और चंचल है तथा इसका निग्रह करना कठिन है।
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