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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 4
सुहृत्वे च रिपुत्वे च उद्धारे चैव बन्धने । आत्मनैवात्मनि ह्यात्मा नात्मा भवति कश्चन ॥
एकमात्र आत्मा ही आत्मा का मित्र और शत्रु है, यही ज्ञान होने से उद्धार करता है और यही अज्ञान होने से बन्धन में डालता है, दूसरा कोई नहीं।
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