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गणेशगीता • अध्याय 5 • श्लोक 21
विषयैः क्रकचैरेतत्संसृष्टं चक्रकं दृढम् । जनश्छेत्तुं न शक्नोति कर्मकीलः सुसंवृतम् ॥
विषयरूपी अरोंसे यह दृढ़ चक्र बना हुआ है और कर्मरूपी कीलों से अच्छी प्रकार जड़ा हुआ है, इस कारण साधारण मनुष्य इसके छेदन करने में समर्थ नहीं होते।
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