Krishjan
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अध्याय 16 — अथ ग्रहभक्तियोगाध्यायः
बृहत्संहिता
42 श्लोक • केवल अनुवाद
नर्मदा नदी के पूर्वभाग, शोण नद, उडू, वङ्ग, सुख, कलिङ्ग, बालोक, शक, पवन, मगध, शबर, प्राग्ज्यौतिष, चीन, कम्बोज,
मेकल, किरात, विटक, पर्वत के बाहर और मध्य में रहने वाले, पुलिन्द जन, द्रविड का पूर्वार्ध, यमुना के दक्षिण तट
विन्ध्याचल के मध्य भाग, कलिङ्ग देश में स्थित जन, पुण्डू, गोलांगूल, श्रीपर्वत, वर्द्धमान, इक्षुवतो नदी, तस्कर, पारतदेशवासी, वन, गौ का पालन करने वाले
बांज, भूसी वाले धान्य, कटुक द्रव्य, वृक्ष, सुवर्ण, अग्नि, विष, युद्ध में शूर, ओषधी, बैद्य, चतुष्पद पशु, किसान, राजा, क्रूर
संग्राम में जीतने को इच्छा रखने वाले, चोर, सर्प, निर्जन स्थान, यशस्वी, तीक्ष्ण ( निम्ब आदि या जन-इन सबों के स्वामी सूर्य है।
पर्वतदुर्ग, जलदुर्ग, कोशल देशवासी मनुष्य, भरुकच्छ, समुद्र, रोमक, तुषार, वनवासी, तद्ङ्गण, हल, खीराज्य, महासागर के अन्तर्गत द्वीप,
मधुर रस, सभी पुष्प और फल, जल,नमक, मणि, शङ्ख, मोती, जल से उत्पन्न होने वाली वस्तु (कमल आदि), धान्य, यव, ओषधी, गेहूँ, सोमरस पीने वाले मनुष्य, आक्रन्द (पार्च रक्षकों के अन्तर्गत राज), ब्राह्मण
श्वेत वर्ण की सभी वस्तुयें, सभी जनों का प्रिय, अश्व, कामी, स्त्री, सेनापति, भोजनसामग्री, वख, शृङ्गी पशु, निशाचर, किसान, याज्ञिक-इन सबों के स्वामी चन्द्र
शोण, नद, नर्मदा नदी और भीमरथा नदी के पश्चिम भाग में स्थित देश, निर्विन्ध्या, वेत्रवती, सिप्रा, गोदावरी, वेणा
पयोष्णी, सिन्धु, मालती और पारा नदी, उत्तर पाण्ड्य, महेन्द्र पर्वत, विन्ध्याचल और मलयगिरि के समीपगत देश, चोल,
द्रविड, विदेह, अन्ध्र, अश्मक, भासापर, कौङ्कण, समन्त्रिषिक, कुन्तल, केरल, दण्डकारण्य, कान्तिपुर, म्लेच्छ, सङ्कर जाति, (नासिक्य, भोगवर्द्धन, तर्कराट, विन्ध्याचल के समीपस्थ देश,
नागर जन, किसान, पारत, अग्निहोत्री, सोनार, शत्र से आजीविका चलाने वाले, वनवासी, दुर्ग, कर्वटदेशवासी जन, वधिक, पापी, कामों में असंलग्न, राजा, बालक, हाथी, दाम्भिक, बालकों को मारने वाले,
पशुपालक, रक्त फल, रक्त पुष्प, प्रवाल, सेनापति, गुड, मदिरा, तीक्ष्ण (निम्ब आदि), कोश, भवन, अग्निहोत्री
कोश, भवन, अग्निहोत्री, धातुओं की खान, शाक्य (रक्तपट), भिक्षु, चोर, शठ (परकार्य से विमुख), दृदृद्वेष, अधिक भोजन-इन सबों का स्वामी मङ्गल है।
लोहित्य और सिन्धु नद, सरयू, गाम्भीरिका, रथाख्या, गङ्गा, कौशिकी, विपाशा, सरस्वती और चन्द्रभागा नदी, मथुरा के पूर्वार्ध भाग,
चित्रकूट पर्वत के प्रान्त में स्थित मनुष्य, सौराष्ट्र देश स्थित मनुष्य, सेतु (पुल) के आश्रय में रहने वाले, जलमार्ग के आश्रय में रहने वाले, पण्यवृत्ती, बिल में निवास करने वाले, पर्वत पर रहने वाले,
वाले, वापी, कूप, तड़ाग आदि, यन्त्र को जानने वाले, गान विद्या जानने वाले, लेखक, मणि के लक्षण को जानने वाले, रंगरेज, सुगन्धि द्रव्य बनाने वाले
जीवनयात्रा चलाने वाले), बालक, कवि, शठ (परोपकार से विमुख), चुगलखोर, अभिचार (वशीकरण, उच्चाटन, विद्वेषण, मारण आदि को जानने वाले), दूत, नपुंसक, हँसी उड़ाने वाले, भूत-प्रेत के तन्त्र को जानने वाले, इन्द्रजाल को जानने वाले
तिल- अक्षोट आदि), बीज, तिक्त (निम्बादि), व्रतो (ब्रह्मचारी आदि), रसायन को जानने वाले, वेसर (अश्वविशेष - इन सबों का स्वामी बुध है।
सिन्धु नद के पूर्व भाग, मथुरा के पश्चिमार्द्ध, भरत, सौवीर, सुघ्न, उत्तर दिशा में रहने वाले, विपाशा नदी, शतद्रू नदी, रमठ, शाल्व
त्रैगर्त, पौरव, अम्बष्ठ, पारत, वाटधान, यौधेय, सारस्वत, अर्जुनायन और मत्स्य देशों के ग्राम और राष्ट्र का
आधा भाग, हाथी, घोड़ा, पुरोहित, राजा, मन्त्री, मङ्गल कार्य (विवाह, उपनयन आदि) में सक्त, पौष्टिक कार्य में संलग्न, दयालु, सत्य भाषण करने वाले, शौचयुत (शुद्ध दूसरे के धनादि को नहीं चाहने वाले),
पस्वी, विद्वान्, दानी, धर्मी, ग्राम में उत्पन्न होने वाले, वैयाकरण, अर्थ को जानने वाले, वेद को जानने वाले, अभिचारज्ञ, नीतिशास्त्र को जानने वाले, राजा के उपकरण
छत्र, ध्वजा, चामर आदि, सुगन्ध द्रव्य, कुष्ठ, मांसी, तगर, रस (बोल), नमक, मूंग आदि, मधुर रस, मधूच्छिष्ट (सिक्यक = मोम), चोरक, सुगन्य द्रव्य- इन सबों का स्वामी गुरु है।
तक्षशिला नगरी, मार्तिकावत देश, बहुगिरि, गान्धार, पुष्कलावतक, प्रस्थल, मालव, कैकय, दाशार्ण, उशीनगर, शिवि
वितस्ता, ऐरावती और चन्द्रभागा नदी के जल पीने वाले, रथ, चान्दी, आकर (अर्थोत्पत्ति स्थान), हाथी, घोड़ा, महामात्र (हस्ती के अधिप), घनी, सुगन्ध द्रव्य, पुष्य, चन्दन, मणि (पद्मराग आदि),
सुगन्ध द्रव्य, पुष्य, चन्दन, मणि (पद्मराग आदि), वज्र (होरक), भूषण, अम्बुरुह (कमल आदि), शय्या, प्रधान, युवा, स्त्री, कामोपकरण (पुष्प, धूप, माला, चन्दन आदि), मृष्ट (शोधित) अन्न का भोजन करने वाले, मधुर भोजन करने वाले, उद्यान, जल, कामी, यशस्वी, सुखी, दाता,
भोजन करने वाले, उद्यान, जल, कामी, यशस्वी, सुखी, दाता, सुन्दर, विद्वान्, मन्त्री, क्रय-विक्रय से जीवनयात्रा चलाने वाले, कुम्भार, चित्राण्डज (नाना प्रकार के पक्षी), फलत्रय (एला, लवङ्ग, कक्कोल), कौशेयपट (नेत्रपट), कम्बल,
कौशेयपट (नेत्रपट), कम्बल, पत्रौर्णिक (धौतकौशेय), रो ( एक प्रकार का सुगन्ध द्रव्य), पत्र (सुगन्ध पत्र), चोच (नारिकेल), जातीफल (जायफल), अगुरु, यचा (वच), पिप्पली (पीपल), चन्दन- इस सबों का स्वामी शुक है।
आनर्त, अर्बुद, पुष्कर, सौराष्ट्र, आभीर, शूद्र, रैवतक, सरस्वती नदी जहाँ पर अलक्षित हुई है-वह प्रदेश (पश्चिम प्रदेश),
कुरुभूमि में उत्पन्न मनुष्य ( स्थानेश्वर निवास करने वाले), प्रभास क्षेत्र, विदिशा नगरी, वेदस्मृती नदी, मही नदी के तट में उत्पन्न मनुष्य, खल, मलिन, नीच, तेली, निर्बल, नपुंसक, बन्धन-स्थानस्थित
बन्धन-स्थानस्थित, पक्षियों को मारने वाले, अशुचि में रत (अपवित्र), घीवर, कुरूप, वृद्ध, सूअर पालने वाले (डोम), सद्धियों में प्रधान, नियम को नहीं पालन करने वाले, शबर, पुलिन्द (म्लेच्छ जाति),
कटु द्रव्य (मरोच आदि), तिक्त (निम्ब आदि), रसायन, विधवा स्त्री, सर्प, चोर, महिषी (भैंस), गदहा, ऊँट, चना, वातल (मटर-राजमाष आदि), धान्य-इन सबों का स्वामी शनि है।
पर्वत के शिखर, कन्दरा ( पर्वतीय निम्न स्थान और दरी (गुहा) में रहने वाले, म्लेच्छ जाति, शूद्र, सियार को खाने वाले, शूलिक, बोक्काण, अश्वमुख, अङ्गहींग मनुष्य
कुल में कलङ्क लगाने वाले, क्रूर, कृतघ्न (उपकार को नहीं मानने वाले), चोर, मिथ्या व्यवहार करने वाले, शौचरहित, कृपण, गदहा, गुप्तचर, बाहुयुद्ध को जानने वाले, अति क्रोधी, गर्त में रहने वाले, नीच
उपहत (कुत्सित पुरुष), मिथ्याधमों, राक्षस, अधिक सोने वाले सभी जन्तु, घर्महीन, उड़द, तिल-इन सबों का स्वामी राहु है।
पर्वत के शिखर, कन्दरा ( पर्वतीय निम्न स्थान और दरी (गुहा) में रहने वाले, म्लेच्छ जाति, शूद्र, सियार को खाने वाले, शूलिक, बोक्काण, अश्वमुख, अङ्गहींग मनुष्य, कुल में कलङ्क लगाने वाले, क्रूर, कृतघ्न (उपकार को नहीं मानने वाले),
परस्त्रीगामी, विवादी, दूसरे का दोष सुनने के लिये उत्कण्ठित, मत्त (पागल), मूर्ख, अधार्मिक, जीतने की इच्छा रखने बाला-इन सबों का स्वामी केतु है।
उदय समय में निर्मल, विपुल, स्वभावस्थित, निर्घात, उल्का, धूलि तथा ग्रहयुद्ध से अहत, अपनी राशि स्थित, उच्चगत या शुभग्रह (चन्द्र, बुध, गुरु और शुक्र) से दृष्ट ग्रह जिनका स्वामी हो, उनके लिये शुभ करने वाला होता है।
जो ग्रह पूर्वोक्त शुभ लक्षणों से विपरीत लक्षण वाला हो, वह अपने परिग्रह वर्ग का शखयुद्ध और रोग से नाश करता है तथा राजाओं को दुःखो करता है।
इस तरह के उत्पात होने पर यदि राजा या लोगों को शत्रु, पुत्र या निश्चित करके मन्त्री का भय न हो तो उनका तथा लोगों को अवृष्टि होने के कारण अपूर्व पुर, पर्वत और नदियों में गमन होता है। अर्थात् इस तरह के उत्पात होने पर राजा या लोगों को शत्रु, पुत्र या मन्त्री का भय अवश्य होता है।
यदि किसी तरह इन आपत्तियों से मुक्ति से जाय तो भी प्राप्त अवृष्टि के कारण अन्न, शाक, जल के लिये जहाँ पर कभी नहीं गया था, उन पुर, पर्वत और नदियों में जाना पड़ता है।
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धर्म का अन्वेषण
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