यदि किसी तरह इन आपत्तियों से मुक्ति से जाय तो भी प्राप्त अवृष्टि के कारण अन्न, शाक, जल के लिये जहाँ पर कभी नहीं गया था, उन पुर, पर्वत और नदियों में जाना पड़ता है।
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