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अध्याय 8 — आठवाँ अध्याय

विदुर नीति
32 श्लोक • केवल अनुवाद
विदुरजी कहते हैं, जो सज्जन पुरुषों से आदर पाकर आसक्तिरहित हो अपनी शक्ति के अनुसार अर्थ-साधन करता रहता है, उस श्रेष्ठ पुरुष को शीघ्र ही सुयश की प्राप्ति होती है, क्योंकि सन्त जिस पर प्रसन्न होते हैं, वह सदा सुखी रहता है।
जो अधर्म से उपार्जित महान् धनराशि को भी उसकी ओर आकृष्ट हुए बिना ही त्याग देता है, वह जैसे साँप आपनी पुरानी केचुल को छोड़ता है, उसी प्रकार दुःखों से मुक्त हो सुखपूर्वक शयन करता है।
झूठ बोलकर उन्नति करना, राजा के पास तक चुगली करना, गुरू से भी मिथ्या आग्रह करना - ये तीन कार्य ब्रह्महत्या के समान हैं।
गुणों में दोष देखना एकदम मृत्यु के समान है । कठोर बोलना या निन्दा करना लक्ष्मी का वध है। सुनने की इच्छा का अभाव या सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्मप्रशंसा-ये तीन विद्या के शत्रु हैं।
स्तब्धता आलस्य, मद-मोह, चञ्चलता, गोष्ठी, उद्दण्डता, अभिमान और लोभ-ये सात विद्यार्थियों के लिये सदा ही दोष माने गये हैं।
सुख चाहने वाले को विद्या कहाँ से मिले ? विद्या चाहने वालो के लिये सुख नहीं है। सुख की चाह हो तो विद्या को छोड़े और विद्या चाहे तो सुख का त्याग करे।
ईंधन से आग की, नदियों से समुद्र की, समस्त प्राणियों से मृत्यु की और पुरुषों से कुलटा स्त्री की कभी तृप्ति नहीं होती।
आशा धैर्य को, यमराज समृद्धि को, क्रोध लक्ष्मी को, कृपणता यश को और सार-संभाल का अभाव पशुओं को नष्ट कर देता है। इधर एक ही बाह्मण यदि क्रुद्ध हो जाय तो सम्पूर्ण राष्ट्र का नाश कर देता है।
बकरियाँ, काँसे का पात्र, चाँदी, मधु, अर्क किचन का यन्त, पक्षी, वेदवेत्ता ब्राह्मण, बूढ़ा, कुटुम्बी और विपत्तिप्ग्रस्त कुलीन पुरुष— ये सब आप के घर में सदा मौजूद रहे।
बकरी, बैल, चन्दन, वीणा, दर्पण, मधु, घी, जल, ताँबे के बर्तन शंख सालग्राम और गोरोचन....
हे भारत! देवता, ब्राह्मण तथा आतिथियों की पुजा के लिये ये सब वस्तुएँ घर पर रखनी चाहिये ,यह मनुजी ने कहा है।
तात! अब मैं तुम्हें बहुत ही महत्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्य जनक बात बता रहा हूँ — कामना से, भय से, लोभ से तथा इस जीवन के लिये भी कभी धर्म का त्याग न करें।
धर्म नित्य है, किन्तु सुख-दुःख अनित्य हैं, जीव नित्य है, पर इसका कारण (अविद्या) अनित्य हैं। आप अनित्य को छोड़कर नित्य में स्थित होइये और सन्तोष धारण कीजिये; क्योंकि सन्तोष ही सबसे बड़ा लाभ है।
धन-धान्यादि से परिपूर्ण पृथ्वी का शासन करके अन्त में समस्त राज्य और विपुल भोगों को यहीं छोड़कर यमराज के वश में गये हुए बड़े-बड़े बलवान् एवं महानुभाव राजाओं की ओर दृष्टि डालिये।
राजन्! जिसको बड़े कष्ट से पाला-पौसा था, वह पुत्र जब मर जाता है तो मनुष्य उसे उठाकर तुरत अपने घर से बाहर कर देते हैं। पहले तो इसके लिये बाल छितराये करुण स्वर में विलाप करते हैं, फिर साधारण काठ की भाँति उसे जलती चिता में झोंक देते हैं।
मरे हुए मनुष्य के धन के पीछे दूसरे लोग भागते हैं, उसके शरीर की धातुऑ को पक्षी खाते हैं या आग जलाती है। यह मनुष्य पुण्य-पाप से बंधा हुआ इन्हीं दोनों के साथ पर लोक में गमन करता है।
तात ! बिना फल-फूल के वृक्ष को जैसे पक्षी छोड़ देते हैं, उसी प्रकार उस प्रेत को उसके जाति वाले, सुहृद् और पुत्र चिता में छोड़कर लौट आते हैं।
अग्‍नि में डाले हुए उस पुरुष के पीछे. तो केवल उसका अपना किया हुआ बुरा या भला कर्म ही जाता है । इसलिये पुरुष को चाहिये कि वह धीरे-धीरे प्रयत्नपूर्वक धर्म का ही संग्रह करे।
इस लोक और परलोक से ऊपर और नीचे तक सर्वेत्र अज्ञान रूप महान् अन्धकार फ़ैला हुआ है, बह इन्द्रियों को महान् मोह में डालने वाला है। राजन्! आप इस को जान लीजिये, जिससे यह आपका स्पर्श न कर सके।
मेरी इस बात को सुनकर यदि आप सब ठीक -ठीक समझ सकेंगे तो इस मनुष्य लोक में आप को महान यश प्राप्त होगा और इहलोक तथा परलोक में आपके लिये भय नहीं रहेगा।
भारत ! यह जीवात्मा एक नदी है, इसमें पुण्य ही तीर्थ है, सत्यस्वरूप परमात्मा से इसका उद्गम हुआ है, धैर्य ही इसके किनारे हैं, इसमें दया की लहरें उठती हैं, पुण्य कर्म करने वाला मनुष्य इसमें स्नान करके पवित्र होता है; क्योंकि लोभरहित आत्मा सदा पवित्र ही हैं।
काम-क्रोधादिरूप ग्राह से भरी, पाँच इन्द्रियों के जल से पूर्ण इस संसार नदी के जन्म-मरण रूप दर्गम प्रवाह को धैर्य की नौका बनाकर पार कीजिये।
जो बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्था में बड़े आदर-सत्कार से प्रसन्न करके उससे कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में प्रश्न करता वह कभी मोह में नहीं पड़ता।
शिश्न और उदर की धैर्य से रक्षा करें, अर्थात् काम वेग और भूख की ज्वाला को धैर्यपूर्वक सहे। इस प्रकार हाथ-परकी नेत्रों से, नेत्र और कानों की मन से तथा मन और वाणी की सत्कर्मों से रक्षा करें।
जो प्रतिदिन जल से स्नान सन्ध्या-तर्पण आदि करता है, नित्य यज्ञोपवीत श्रावण किये रहता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पतितों का अन्न त्याग देता है, सत्य बोलता और गुरु की सेवा करता है, वह ब्राह्मण कभी ब्रह्मलोक से भ्रष्ट नहीं होता।
वेदों को पढ़कर, अग्निहोत्र के लिये अग्नि के चारो और कुश बिछाकर नाना प्रकार के यज्ञों द्वारा यजन कर और प्रजाजन का पालन करके गौ और ब्राह्मणों के हितके लिये संग्रामनें मूत्युको प्राप्त हआ क्षत्रिय शस्त्रसे अन्त करण मवित्र हो जाने के कारण उर्ध्व लोक को जाता है।
वैश्य यदि वेद-शासत्रों का अध्ययन करे बहाण, क्षत्रिय तथा आश्रित ना को समय-समय पर धन देकर, उनकी सहायता करे और यज्ञों द्वारा तीनों अग्नियों के पतित्र धूम की सुगन्ध लेता रहे तो बह मरने कि पश्चात् स्वर्ग लोक में दिव्य सुख भोगता हैं ।
शूद्र यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य की क्रम से न्यायपूर्वक सेवा करके इन्हें सन्तुष्ट करता है, तो वह व्यथा से रहित हो पापों से मुक्त होकर देह-त्याग के पश्चात् स्वर्ग सुख का उपभोग करता है।
महाराज आपसे यह मेंने चारों वणौ का धर्म बताया है; इसे बताने का कारण भी सुनिये। आपके कारण पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर क्षत्रिय धर्म से अच्युत हो रहे हैं, अतः आप उन्हें पुनः राजधर्म में नियुक्त कीजिये।
धृतराष्ट्र ने कहा -विदुर ! तुम प्रतिदिन मुझे जिस प्रकार उपदेश दिया करते हो, वह बहुत ठीक है। सौम्य ! तुम मुझसे जो कुछ भी कहते हों ऐसा ही मेरा भी विचार है।
यह्यपि मैं पाण्डवो के प्रति सदा ऐसी हो बुद्धि रखता हूँ, तथापि दुर्योधन से मिलने पर फिर बुद्धि पलट जाती है।
प्रारब्ध का उल्लङ्कन करने की शक्ति किसी भी प्राणी में नहीं है। मैं तो प्रारब्ध को ही अचल मानता हूँ उसके सामने पुरुषार्थ तो व्यर्थ है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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