मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 2
महान्तमप्यर्थमधर्मयुक्तं यः सन्त्यजत्यनुपाक्रुष्ट एव। सुखं स दुःखान्यवमुच्य शेते जीर्णां त्वचं सर्प इवावमुच्य ॥
जो अधर्म से उपार्जित महान् धनराशि को भी उसकी ओर आकृष्ट हुए बिना ही त्याग देता है, वह जैसे साँप आपनी पुरानी केचुल को छोड़ता है, उसी प्रकार दुःखों से मुक्त हो सुखपूर्वक शयन करता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
विदुर नीति के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

विदुर नीति के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें