जो अधर्म से उपार्जित महान् धनराशि को भी उसकी ओर आकृष्ट हुए बिना ही त्याग देता है, वह जैसे साँप आपनी पुरानी केचुल को छोड़ता है, उसी प्रकार दुःखों से मुक्त हो सुखपूर्वक शयन करता है।
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