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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 25
नित्योदकी नित्ययज्ञोपवीती नित्यस्वाध्यायी पतितान्न वर्जी । ऋतं ब्रुवन्गुरवे कर्म कुर्वन् न ब्राह्मणश्च्यवते ब्रह्मलोकात् ॥
जो प्रतिदिन जल से स्नान सन्ध्या-तर्पण आदि करता है, नित्य यज्ञोपवीत श्रावण किये रहता है, नित्य स्वाध्याय करता है, पतितों का अन्न त्याग देता है, सत्य बोलता और गुरु की सेवा करता है, वह ब्राह्मण कभी ब्रह्मलोक से भ्रष्ट नहीं होता।
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