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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 12
इदं च त्वां सर्वपरं ब्रवीमि पुण्यं पदं तात महाविशिष्टम् । न जातु कामान्न भयान्न लोभाद् धर्मं त्यजेज्जीवितस्यापि हेतोः ॥
तात! अब मैं तुम्हें बहुत ही महत्वपूर्ण एवं सर्वोपरि पुण्य जनक बात बता रहा हूँ — कामना से, भय से, लोभ से तथा इस जीवन के लिये भी कभी धर्म का त्याग न करें।
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