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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 15
मृतं पुत्रं दुःखपुष्टं मनुष्या उत्क्षिप्य राजन्स्वगृहान्निर्हरन्ति । तं मुक्तकेशाः करुणं रुदन्तश् चितामध्ये काष्ठमिव क्षिपन्ति ॥
राजन्! जिसको बड़े कष्ट से पाला-पौसा था, वह पुत्र जब मर जाता है तो मनुष्य उसे उठाकर तुरत अपने घर से बाहर कर देते हैं। पहले तो इसके लिये बाल छितराये करुण स्वर में विलाप करते हैं, फिर साधारण काठ की भाँति उसे जलती चिता में झोंक देते हैं।
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