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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 23
प्रज्ञा वृद्धं धर्मवृद्धं स्वबन्धुं विद्या वृद्धं वयसा चापि वृद्धम् । कार्याकार्ये पूजयित्वा प्रसाद्य यः सम्पृच्छेन्न स मुह्येत्कदा चित् ॥
जो बुद्धि, धर्म, विद्या और अवस्था में बड़े आदर-सत्कार से प्रसन्न करके उससे कर्तव्य-अकर्तव्य के विषय में प्रश्न करता वह कभी मोह में नहीं पड़ता।
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