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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 27
वैश्योऽधीत्य ब्राह्मणान्क्षत्रियांश् च धनैः काले संविभज्याश्रितांश् च । त्रेता पूतं धूममाघ्राय पुण्यं प्रेत्य स्वर्गे देव सुखानि भुङ्क्ते ॥
वैश्य यदि वेद-शासत्रों का अध्ययन करे बहाण, क्षत्रिय तथा आश्रित ना को समय-समय पर धन देकर, उनकी सहायता करे और यज्ञों द्वारा तीनों अग्नियों के पतित्र धूम की सुगन्ध लेता रहे तो बह मरने कि पश्चात् स्वर्ग लोक में दिव्य सुख भोगता हैं ।
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