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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 22
कामक्रोधग्राहवतीं पञ्चेन्द्रिय जलां नदीम् । कृत्वा धृतिमयीं नावं जन्म दुर्गाणि सन्तर ॥
काम-क्रोधादिरूप ग्राह से भरी, पाँच इन्द्रियों के जल से पूर्ण इस संसार नदी के जन्म-मरण रूप दर्गम प्रवाह को धैर्य की नौका बनाकर पार कीजिये।
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