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विदुर नीति • अध्याय 8 • श्लोक 4
असूयैक पदं मृत्युरतिवादः श्रियो वधः । अशुश्रूषा त्वरा श्लाघा विद्यायाः शत्रवस्त्रयः ॥
गुणों में दोष देखना एकदम मृत्यु के समान है । कठोर बोलना या निन्दा करना लक्ष्मी का वध है। सुनने की इच्छा का अभाव या सेवा का अभाव, उतावलापन और आत्मप्रशंसा-ये तीन विद्या के शत्रु हैं।
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