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अध्याय 7 — ग्रहयुत्यधिकार:
सूर्य सिद्धांत
24 श्लोक • केवल अनुवाद
भौम आदि पाँचों ग्रहों का परस्पर योग, युद्ध एवं समागम संज्ञक होता है। चन्द्र के साथ भौम आदि ग्रहों का योग होने पर समागम; तथा सूर्य के साथ भौम आदि ग्रहों का अथवा चन्द्रमा का योग हो तो अस्त संज्ञक होता है।
जिन दो ग्रहों की युति ज्ञात करनी हो उनमें यदि मन्दगतिग्रह से शीघ्रगतिग्रह अधिक हो तो गतयुति तथा न्यून हो तो गम्ययुति होती है। यदि दोनों ग्रह वक्री हों तो इससे विपरीत क्रम से युति होती है। अर्थात् मन्दगति ग्रह से शीघ्र गतिग्रह अधिक हो तो गम्य युति और न्यून हो तो गतयुति होती है। यदि एक ग्रह वक्री हो, तथा मार्गी ग्रह से न्यून हो तो गतयुति, अधिक हो तो गम्ययुति होती है।
अभीष्ट युति सम्बन्धि दोनों ग्रह यदि वक्री या मार्गी हो तो उन ग्रहों की अन्तरकला को अपनी अपनी गतिकला से गुणाकर गुणनफल में उन दोनों ग्रहों की गत्यन्तरकला से भाग दें। यदि एक ग्रह वक्री और एक ग्रह मार्गी हो तो उनकी अन्तर कला को अपनी-अपनी गति कला से गुणाकर अपनी गतियोग से भाग दें।
जो लब्धि प्राप्त हो उसे गतयोग हो तो मार्गी ग्रहों में हीन और वक्री ग्रहों में युत करें। एष्य युति हो तो मार्गी ग्रहों में युत और वक्री ग्रहों में हीन करें। यदि एक ग्रह वक्री और एक ग्रह मार्गी हो तो स्व-स्वफल को युत-हीन करें। अर्थात् गतयोग होने पर मार्गी ग्रह में अपना फल हीन और कक्री ग्रह में युक्त करें।
गम्ययुति हो तो मार्गी ग्रह में धन और वक्री ग्रह में ऋण करें। इस प्रकार राशि चक्र में स्थित राश्यादि ग्रह समकल होते हैं।
इष्टकालिक युति सम्बन्धि ग्रहों के अन्तर में उन दोनों ग्रहों के गत्यन्तर का भाग देने से गत युति में गत तथा गम्ययुति में एष्य दिनादि होते हैं।
दृक्कृम साधन के लिये समान ग्रहों का दिनमानं रात्रिमान और शस्कला का साधन कर अपने-अपने लग्न द्वारा नतकाल और उन्नतकाल का साधन करना चाहिए।
पलभा को शर से गुणाकर १२ का भाग देने से जो फल प्राप्त हो उसे अपनी अपनी नत घटी से गुणाकर अपने अपने दिनार्ध से भाग दें यंदि रात्रि में नतोन्नतकाल हो तो रात्र्यर्ध से भाग दे।
लब्ध कलादि फल को ग्रहों में धन, ऋण करें अर्थात् उत्तर शर हो तो पूर्वकपाल में ऋण और पश्चिमकपाल में धन, तथा दक्षिण शर हो तो पूर्वकपाल में धन और पश्चिमकपाल में ऋण।
पूर्व साधित शरकला को सत्रिभग्रह के क्रान्त्यंश से गुणा करने से आयनदूक्करम विकला होती हैं। इन विकलाओं को, सत्रिभ ग्रह की क्रान्ति और शर की एक दिशा हो तो ग्रह में ऋण और भिन्न दिशा हो तो ग्रह में धन करना चाहिए।
नक्षत्र और ग्रहों की युतिसाधन में, ग्रहों के उदयास्त साधन में तथा चन्द्र की श्रृड्रोत्नति साधन में आयन दूक्कर्म और आंकक्षदृक्कर्म का संस्कार पहले ही कहा गया है।
दूक्कर्मद्रयसंस्कृत ग्रहों का युतिकाल जान कर, युतिकाल में ग्रहों का साधन कर दोनों. दृक्कर्मों का संस्कार करना चाहिये। इस प्रकार असकृत् कर्म करने से दूक्॒र्मद्रवसंस्कृतग्रह तुल्य होते हैं। इन तुल्य ग्रहों के तात्कालिक शरों का एक दिशा में अन्तर और भिन्न दिशा में योग करने से युतिसम्बन्धि ग्रहबिम्बों के केन्द्रों का याम्योत्तर अन्तर होता है।
भौम का ३०, शनि का अर्धार्थ = १/४ वर्धित अर्थात् (३०+ ३०/४ = ३० + ७(१/२) = ३७(१/२), बुध का ३७(१/२) + ७(१/२) = ४५, बृहस्पति का ४५ + ७(१/२) = ५२(१/२), और शुक्र का ५२(१/२) + ७(१/२) = ६० योजन के तुल्य चन्द्रकक्षा में बिम्बव्यास कहा है।
समतल भूमि में ग्रह से विलोमदिशा में पड़ी हुई ग्रह की छाया के अग्रभाग में स्थापित किये गए दर्पण में स्थित ग्रह को गणक दिखलावे। वह आकाश में दिक्सम्पात में स्थित शंकु के अग्र में दीखता है।
समतल भूमि में ग्रह से विलोमदिशा में पड़ी हुई ग्रह की छाया के अग्रभाग में स्थापित किये गए दर्पण में स्थित ग्रह को गणक दिखलावे। वह आकाश में दिक्सम्पात में स्थित शंकु के अग्र में दीखता है।
युति सम्बन्धि ग्रहों को देखने के लिये काष्ठादिनिर्मित पाँच हाथ लम्बे दो शंकुओं को, जिस दिशा में ग्रह भ्रमण करते हों, उस दिशा में ग्रहों के याम्योत्तर अन्तर के तुल्य अन्तरित एक दो हाथ गहरे गर्त में दृढ़ता से स्थापित करना चाहिए।
शंकुओं के मूल से ग्रहाधिष्ठित कपाल में छायाग्र से शंकुओं के अग्रपर्यन्त छाया कर्णो का दान करना चाहिए। यहाँ ग्रहों की छाया चार हाथ के शक के प्रमाण से साधन करनी चाहिए। छायाकर्णाग्र के संयोग में स्थित द्र॒ष्टा को, आकाश में अपने शंकुओं के अग्र में स्थित दूक् तुल्य ग्रहों को दिखलाना चाहिये।
भौम आदि पज्चतारा ग्रहों की बिम्ब नेमियों का स्पर्शमात्र हो तो उल्लेखसंज्ञक, और मण्डल का: भेद हो तो भेदसंज्ञक तथा परस्पर दो ग्रहों के किरणों का योग हो तो अंशुविमर्द संज्ञक युद्ध होता है।
दो ग्रहों का याम्योत्तर अन्तर एक अंश से कम हो तो अपसव्यसंज्ञक युद्ध होता है। यदि इनमें एक ग्रह का बिम्ब छोटा हो तो अपस॒व्ययुद्ध व्यक्त होता है अन्यथा अव्यक्त। दो ग्रहों का याम्योत्तर अन्तर एक अंश से अधिक हो तो समागम होता है। (यहाँ यदि दोनों ग्रह बलवानू अर्थात् स्थूलता से युक्त हों तो व्यक्त समागम अन्यथा अव्यक्त समागम होता है)
अपसव्यसंज्ञक युद्ध में जिस ग्रह का बिम्ब आच्छादित हो, अथवा बिम्ब छोटा हो या प्रभारहित, रूखा, स्वाभाविक वर्ण से हीन तथा दक्षिण दिशा में स्थित हो तो उस ग्रह को पराजित समझना चाहिए।
दूसरे ग्रह की अपेक्षा उत्तर दिशा में स्थित, दीप्तिमान्, बृहद् बिम्बवाला ग्रह जयी होता है। दक्षिण दिशा में भी बलवान् अर्थात् जिस ग्रह का बिम्ब दीप्तिमान् और बड़ा हो वह ग्रह जयी होता है।
यदि दोनों ग्रहों के बिम्ब आसतन्न अर्थात् युद्ध लक्षणों से युक्त होने पर भी प्रभायुक्त हों तो समागमसंज्ञक युद्ध होता है। यदि दोनों के बिम्ब सूक्ष्म और विध्वस्त अर्थात् पराजय के लक्षणों से युक्त हों तो कूट एवं विग्रह संज्ञक युद्ध होता है अर्थात् दोनों के सूक्ष्म बिम्ब हों तो कूटसंज्ञक युद्ध तथा दोनों ग्रहों के बिम्ब विध्वस्त हों तो विग्रह संज्ञक युद्ध होता है।
उत्तर दिशा में या दक्षिण दिशा में स्थित शुक्र, प्राय: विजयी ही होता है। (अर्थात् कदाचित् ही पराजित होता है)। चन्द्रमा के साथ भौम आदि पज्च ताणग्रहों का युति साधन पूर्वोक्त रीति से करना चाहिए।
अपनी-अपनी कक्षा में स्थित, भ्रमण करते हुए ग्रह युतिकाल में परस्पर अति दूर होते हुये भी ऊध्वधिर अन्तर के दृश्य न होने से मिले हुए (अन्योन्याश्रित) दिखाई देते हैं। यह ग्रहयुतिरूप कल्पना लोक के शुभाशुभफल के लिये कही गई है। वस्तुत: न ग्रहों का युद्ध होता है और न ग्रह परस्पर युक्त होते हैं।
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