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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 7 • श्लोक 24
युतिसाधन प्रयोजनम्‌ भावाभावाय लोकानां कल्पनेयं प्रदर्शिता । स्वमार्गगा: प्रयान्त्येते दूरमन्योउन्यमाश्रिता: ॥ ॥ सूर्यसिद्धान्ते ग्रहयुत्यधिकार: सम्पूर्ण: ॥
अपनी-अपनी कक्षा में स्थित, भ्रमण करते हुए ग्रह युतिकाल में परस्पर अति दूर होते हुये भी ऊध्वधिर अन्तर के दृश्य न होने से मिले हुए (अन्योन्याश्रित) दिखाई देते हैं। यह ग्रहयुतिरूप कल्पना लोक के शुभाशुभफल के लिये कही गई है। वस्तुत: न ग्रहों का युद्ध होता है और न ग्रह परस्पर युक्त होते हैं।
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