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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 7 • श्लोक 3
ग्रहयोस्तुल्यत्वं युतिकालज्चाह प्राग्यायीन्यधिकेड्तीतो वक्रिण्येष्य: समागम: । ग्रहान्तरकला: स्वस्वभुक्तिलिप्तासमाहता: ।।
अभीष्ट युति सम्बन्धि दोनों ग्रह यदि वक्री या मार्गी हो तो उन ग्रहों की अन्तरकला को अपनी अपनी गतिकला से गुणाकर गुणनफल में उन दोनों ग्रहों की गत्यन्तरकला से भाग दें। यदि एक ग्रह वक्री और एक ग्रह मार्गी हो तो उनकी अन्तर कला को अपनी-अपनी गति कला से गुणाकर अपनी गतियोग से भाग दें।
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