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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 7 • श्लोक 12
ग्रहयुतिसाधने वैशिष्टयम्‌ तात्कालिकौ पुन: कार्यों विक्षेपौ च ततस्तयो: । दिक्तुल्येत्वन्तरं भेदे योग: शिष्टं ग्रहान्तरम्‌ ॥
दूक्कर्मद्रयसंस्कृत ग्रहों का युतिकाल जान कर, युतिकाल में ग्रहों का साधन कर दोनों. दृक्कर्मों का संस्कार करना चाहिये। इस प्रकार असकृत्‌ कर्म करने से दूक्॒र्मद्रवसंस्कृतग्रह तुल्य होते हैं। इन तुल्य ग्रहों के तात्कालिक शरों का एक दिशा में अन्तर और भिन्न दिशा में योग करने से युतिसम्बन्धि ग्रहबिम्बों के केन्द्रों का याम्योत्तर अन्तर होता है।
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