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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 7 • श्लोक 2
युतेर्गतैष्यत्वम्‌ शीघ्रे मन्दाधिकेडतीत: संयोगो भविताउन्यथा । द्वयो: प्रागयायिनोरेवं वक्रिणोस्तु विपर्ययात्‌ ॥
जिन दो ग्रहों की युति ज्ञात करनी हो उनमें यदि मन्दगतिग्रह से शीघ्रगतिग्रह अधिक हो तो गतयुति तथा न्यून हो तो गम्ययुति होती है। यदि दोनों ग्रह वक्री हों तो इससे विपरीत क्रम से युति होती है। अर्थात्‌ मन्दगति ग्रह से शीघ्र गतिग्रह अधिक हो तो गम्य युति और न्यून हो तो गतयुति होती है। यदि एक ग्रह वक्री हो, तथा मार्गी ग्रह से न्यून हो तो गतयुति, अधिक हो तो गम्ययुति होती है।
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