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सूर्य सिद्धांत • अध्याय 7 • श्लोक 17
छायाकर्णों ततो दद्याच्छायाग्राचछककुमूर्थगों । छायाकर्णग्रसंयोगे संस्थितस्य प्रदर्शयेत्‌ ॥ स्वशंकुमूर्थगो व्योम्नि ग्रहौ दृकतुल्यतामितौ ।
शंकुओं के मूल से ग्रहाधिष्ठित कपाल में छायाग्र से शंकुओं के अग्रपर्यन्त छाया कर्णो का दान करना चाहिए। यहाँ ग्रहों की छाया चार हाथ के शक के प्रमाण से साधन करनी चाहिए। छायाकर्णाग्र के संयोग में स्थित द्र॒ष्टा को, आकाश में अपने शंकुओं के अग्र में स्थित दूक्‌ तुल्य ग्रहों को दिखलाना चाहिये।
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