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अध्याय 11 — एकादश अध्याय

शिवभारतम्
38 श्लोक • केवल अनुवाद
पंडित बोले - अपने बुद्धिमान शिवाजी बेटे को पुणे प्रांत भेजकर शाहजी राजे ने कर्नाटक में रहकर क्या किया?
जिसने शत्रुओं को जीत लिया है एवं जिसके युद्ध का पराक्रम प्रसिद्ध है ऐसे शहाजी के साथ स्वयं महमूदशाह किस प्रकार का व्यवहार करता था?
कविंद्र बोले - संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय एवं द्वैध इन षाड्गुण्यों का प्रयोग करके तथा विविध प्रकार की कूट नीतियों के बल पर शाह जी ने संपूर्ण कर्नाटक को अपने अधीन कर लिया था।
शरणागत जगदेव ने प्रणाम करके इसके शासन को फूलों की तरह सिर पर धारण किया।
मदुरई का अजेय राजा भी इसके आदेशों का पालन करने लगा एवं मैसूर के राजा ने भी इसकी अधीनता को स्वीकार कर लिया।
दुष्ट रणदुल्लाखान के द्वारा बलात लिए गए अपने सिंहासन पर शिवाजी के आश्रय से वीरभद्र पुनः बैठ गया।
प्रसंगानुसार नीतियों का प्रयोग करने वाले बुद्धिमान शाहजी के प्रभाव से अनेक राजाओं ने यवनों के भय को त्याग दिया था।
अन्यों के लिए कठोर रणदुल्लाखान, अपने सभी स्वामी के कार्यों को शाहजी की सलाह से करने लगा।
बाद में सेनापत्ति रणदुल्लाखान की मृत्यु हो जाने पर कर्नाटक के राजाओं को शीघ्र अपने अधीन करने के लिए जिन जिन सेनापत्तियों को आदिलशाह ने वहां भेजा, वे सब सेनापति, उनके अभीष्ट कार्यों की सिद्धि हेतु साहनी के नीतियों का अनुसरण करने लगे।
तब अनैतिकता का आश्रय लेने वाले इब्राहिम आदिलशाह के पुत्र ने अभिमान से भोसले राजा को कैद करने का मुस्तफाखान को आदेश दिया।
फिर दुंदुभी ध्वनि से समुद्र को प्रतिध्वनित करता हुआ, योद्धा के जय शब्द से दिशाओं को संपूरित करते हुए, चंचल ध्वजों से आकाशीय विद्युत को तिरस्कृत करते हुए, हाथियों के सूंड़ के अग्रभाग से बादलों को हटाते हुए, घोड़ों के द्वारा उढ़ाई हुई धूल से सूर्य को छुपाते हुए, सेना समूहों से मार्गस्थ नदियों के जल को समाप्त करते हुए, उच्चावच भूमि को समतल करते हुए, वह मुस्तफाखान, शत्रु योद्धाओं से व्याप्त कर्नाटक पहुंच गया।
सेनापति पद को प्राप्त हुआ, आदिलशाह का विश्वासपात्र, कपट रूपी वृक्ष की भूमि, खुरासान प्रांत का अर्क, महामानी, उच्च कुल में उत्पन्न, प्रसिद्ध मुस्तफाखान, यह अनेक सेनापतियों के साथ आ रहा है, इस प्रकार सुनकर अपना अविश्वासी होते हुए भी विश्वास दिखाते हुए, शाहजी राजा अपनी सेना के साथ जल्दी से उसके सामने गया।
परस्पर अत्यधिक स्नेह दिखाने वाले उन दोनों के मिलन का कार्यक्रम, दो मित्रों के मिलन के समान मार्ग में बड़े हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुआ।
उस समय उन दोनों ने वहां वस्त्र, आभूषणं, हाथी, घोड़े, ये सब परस्पर विपुल मात्रा में अर्पित किए।
उस समय मुस्तफाखान की सेना के निवास स्थल के समीप ही बलशाली शहाजीराजे भोसले ने अपनी सेना का निवास स्थल बनाया।
दोषदर्शी मुस्तफाखान जब जब देखता था तब तब उसको शाहजी राजा अत्यंत तैयारी में दिखा।
अपने विषय में विश्वास जगाने के लिए प्रेम दिखाकर मुस्तफाखान शाहजी राजा को सभी कार्यों में आगे करता था।
वेगपूर्वक खड़े होकर, दूर से सम्मुख जाकर, हाथ पकड़ कर, आनंदित होकर, हाथों में हाथ डालकर, उपमा आधा आसन देकर, उसकी तरफ मुंह करके मंद हास्य से बोलकर, प्रीति पूर्वक देखकर, अनेक प्रकार के गुप्त बातों को प्रकाशित करके, सभी कार्यों में पुरस्कारों से पुरस्कृत करके, मूल्यवान उपहारों को देकर, प्रशंसा करके, अत्यंत हंसी-मजाक करके, आध्यात्मिक कथाओं का कथन करके, हितकारी विषयों में अभिमान जागृत करके या अपना वृत्तांत बता करके, वह प्रतिदिन उस पर अपना विश्वास दिखाता था।
तत्पश्चात, वह न्याय कार्य में निपुण सेनापति ने समस्त सेनापतियों को एकांत में बुलाकर ये वाक्य कहे।
मुस्तफाखान बोला - जो सेवक जिसके अन्न को खाता है, उस सेवक का वह अन्न ही प्राण हैं, उस सेवक का स्वयं का प्राण उसका प्राण नहीं है।
विद्या के बिना महानता नहीं, प्रतिभा के बिना काव्य नहीं, उसी प्रकार स्वामी की कृपा के बिना अभीष्ट कार्य की सिद्धि नहीं देखी।
अतः जो नौकर स्वामी के कार्य के लिए अपने प्राणों को त्याग देता है, वहीं धन्य पुरुष होता है ऐसा नीतिशाखज्ञ कहते हैं।
स्वामी की सेवा में आसक्त लोगों के द्वारा संबंधियों, मित्रों, बांधवों, सगे भाई एवं पिता का भी अवधान नहीं करना चाहिए।
जिसके संतुष्ट होने पर संतुष्ट होता है, जिसके दुःखी होने पर दुःखी होता है, ऐसे स्वामी की सेवा कौन-सा पुरुष एकनिष्ठ होकर नहीं करता है?
हम सब लोग इस समय पूर्णतः उसके अधीन है तो सब मिलकर महमूद के हित के लिए प्रयत्न करेंगे।
अपने अभिमानी, धनवान्, महमूदशाह ने "शाहाजी को कैद करो" ऐसा आज संदेश भेजकर मुझे बताया है, तो हम स्वहित के इच्छुक लोगों के द्वारा बलशाली शहाजीराजा भोसलें जब तक जागृत नहीं होते है तब तक यह कार्य करना चाहिए।
आज की रात्रि के बीत जाने पर उषाकाल में अपने-अपने सैनिकों के साथ इकट्ठे होकर उस राजा को पकड़ लो।
इस प्रकार उस मुस्तुफाखान के सेनानायकों से कार्य सिद्धि हेतु निवेदन करने पर वे अपने-अपने शिविरों में चले गये।
यह मन्त्रणा उन यवनों ने जिस रात्रि में की थी, उसी रात्रि में शहाजी के शिविर में बड़ा उत्पात मच गया था।
घोड़े आंसु बहाने लगे, हाथी करुण स्वर निकालने लगे, ध्वज क‌ङ्कङ् ध्वनि करके अचानक टूटने लगे।
बिना बजायें ही नगाड़े भयंकर आवाज करने लगे, अचानक चक्रवाक धूलसहित गोल-गोल घूमने लगी।
बादलों के बिना ही आकाश से ओले चारों ओर गिरने लगे, बादलों के बिना ही आकाश में आकाशीय विद्युत चमकने लगी।
दीपक प्रज्वलित करने के समय में प्रज्वलित नहीं हुए तथा मनुष्यों के मुख एवं मन मलिन हो गये।
सेना के समीप ही भालु अशुभ आवाज निकालने लगे, कुत्ते ऊपर मुंह करके अत्यन्त निन्दित आवाज करने लगे।
बारंबार अत्यन्त समीप आकर उल्लु घूत्कार की आवाजे करने लगे, उसी प्रकार लोमडियां अचानक भयंकर आवाज करने लगी।
प्रत्येक मन्दिर में देवों की मूर्तियां कम्पित होने लगी, मध्यरात्रि में अचानक गाये ऊंची आवाज करने लगी।
इस प्रकार की भय सूचक चिह अनेक हुए तथापि वह शहाजी राजा दुर्भाग्य से जागृत नहीं हुआ।
जिनके साथ मध्यरात्रि में मुस्तुफाखान ने बहुत समय तक मन्त्रणा की थी, वे सेनानायक अपने-अपने शिविरों में तैयार होकर स्थित है, इस प्रकार गुप्तचरों के द्वारा आकर बताने पर उसको सुनकर भी अत्यन्त बलशाली शहाजी राजा ने दुर्भाग्य से तत्काल उचित कार्य नहीं किया।
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