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शिवभारतम् • अध्याय 11 • श्लोक 31
चक्रिरे नाहता एव पटहाः क्रूरमारवम्। रजसा सहस्रावर्त वितेने वातमण्डली ।।
बिना बजायें ही नगाड़े भयंकर आवाज करने लगे, अचानक चक्रवाक धूलसहित गोल-गोल घूमने लगी।
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