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शिवभारतम् • अध्याय 11 • श्लोक 24
यस्मिंस्तुष्टे तुष्टिमेति यस्मिन् रुष्टेऽस्तमेति च। तमनन्येन मनसा न विषेवेत कः पुमान्।।
जिसके संतुष्ट होने पर संतुष्ट होता है, जिसके दुःखी होने पर दुःखी होता है, ऐसे स्वामी की सेवा कौन-सा पुरुष एकनिष्ठ होकर नहीं करता है?
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