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शिवभारतम् • अध्याय 11 • श्लोक 18
प्रत्युत्थाने तरसा दूरप्रत्युद्गमेन च। हस्ताश्लेषेण हर्षेण हस्तसंधारणेन च ।। अर्धासुनप्रदानेन संमुखीभवनेन च। स्मितपूर्वेण वचसा तथा प्रीतिस्पृशा दृशा ।। तत्तन्मन्त्रप्रयोगाणां प्रकाशकरणेन च। तेषु तेषु च कार्येषु पुरस्कारेण भूयसा ।। अर्हेण परिवहॅण संस्तवेन स्तवेन च। परिहास रसेनोच्वैरध्यात्मकथनेन च। परिहास रसेनोच्वैरध्यात्मकथनेन च।। हिताहंतोद्भावनेन स्ववृत्तावेदनेन च। यवनः सोऽन्वहं तस्मै प्रत्ययं समदर्शयत्।।
वेगपूर्वक खड़े होकर, दूर से सम्मुख जाकर, हाथ पकड़ कर, आनंदित होकर, हाथों में हाथ डालकर, उपमा आधा आसन देकर, उसकी तरफ मुंह करके मंद हास्य से बोलकर, प्रीति पूर्वक देखकर, अनेक प्रकार के गुप्त बातों को प्रकाशित करके, सभी कार्यों में पुरस्कारों से पुरस्कृत करके, मूल्यवान उपहारों को देकर, प्रशंसा करके, अत्यंत हंसी-मजाक करके, आध्यात्मिक कथाओं का कथन करके, हितकारी विषयों में अभिमान जागृत करके या अपना वृत्तांत बता करके, वह प्रतिदिन उस पर अपना विश्वास दिखाता था।
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