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शिवभारतम् • अध्याय 11 • श्लोक 20
मुस्तुफाखान उवाच - यस्यान्नं भुज्यते येन मनुजेनानुजीविना । तस्य यो स भवेदात्मा नादसीयः कदाचन ।।
मुस्तफाखान बोला - जो सेवक जिसके अन्न को खाता है, उस सेवक का वह अन्न ही प्राण हैं, उस सेवक का स्वयं का प्राण उसका प्राण नहीं है।
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