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अध्याय 56 — अथ प्रासादलक्षणाध्यायः

बृहत्संहिता
30 श्लोक • केवल अनुवाद
बहुत जल वाले जलाशय बनाकर और बागीचा लगाकर यश और धर्म की वृद्धि के लिये देवता का मन्दिर बनाना चाहिये।
इष्ट (यज्ञ आदि) करने से, पूर्त (वापी, कूप, तडाग आदि) बनाने से जो लोक मिलते हैं, उन दोनों को चाहने वाले मनुष्य को देवालय का निर्माण कराना चाहिये; क्योंकि इसमें दोनों लोक दिखाई देते हैं।
कृत्रिम अथवा अकृत्रिम जल और उपवन से समन्वित स्थान के समीप में देवताओं का आगमन होता है।
जिस सरोवर में कमलरूप छत्र से सूर्यकिरण दूर किये गये हों; हंसों के कन्धों से प्रेरित श्वेत कमलों से बने मार्गों में निर्मल जल हो;
जहाँ हंस, कारण्डव, क्रौञ्च और चक्रवाक शब्द कर रहे हों और जहाँ पर तट में स्थित निचुल वृक्षों की छाया में जीव विश्राम करते हों, ऐसे सरोवर में देवगण सदा निवास तथा विहार करते हैं ।
जिसका क्रौद्ध पक्षीरूप काञ्ची-कलाप, कलहंसों का मधुर शब्दरूप शब्द, तट में स्थित फूले हुये वृक्षरूप कर्णपूर, रूप उठे हुये स्तन और हंसरूप हास्य है
ऐसी नीचे को बहने वाली नदियों के समीप जल और थल का संयोगरूप श्रोणीमण्डल, पुलिन- में देवता निवास करते हैं।
वन, नदी, पर्वत और झरनों के समीप में तथा उपवनों से युत नगरों में देवता विहार करते हैं।
पहले ब्राह्मण आदि वर्णों को गृह बनाने के लिये जिस प्रकार की भूमि शुभ कही गई है; देवालय बनाने के लिये भी उन वर्षों के लिये वैसी ही भूमि श्रेष्ठ होती है।
देवालय में सदा पूर्वोक्त चौंसठ पद का वास्तु बनाना चाहिये तथा मध्यम द्वार सब दिशाओं में स्थित हो तो श्रेष्ठ होता है।
देवालय का जितना विस्तार हो, उससे दूनी ऊँचाई और ऊँचाई की तिहाई कटि होती है। सोढ़ी के ऊपर जहाँ से देवालय का प्रारम्भ होता है उसको 'कटि' कहते हैं।
विस्तार के आधा गर्भ शेष सब दिशाओं में भीत बनती है। गर्भ के चौथाई के समान द्वार का विस्तार और द्विगुणित विस्तारतुल्य द्वार की ऊंचाई होती है।
द्वार की ऊँचाई तुल्य शाखा (चौखट का बाजू) और उदुम्बर (चौखट के ऊपर की लकड़ी) को चौड़ाई होती है तथा शाखा की चौथाई को चौथाई के तुल्य शाखाओं की मोटाई होती है। शाखाओं की चौड़ाई के बीच में तीन, पाँच, सात या नव शाखायें होने से द्वार श्रेष्ठ होता है।
शाखाओं के तीन-चौथाई भागों को हंस आदि शुभ पक्षी, बेल, स्वस्तिक ( चिह्नविशेष), कलश, स्त्री-पुरुष का जोड़ा, पत्ते और लताओं से शोभित करना चाहिये। द्वार की ऊँचाई में उसका अष्टमांश घटा कर जो शेष बचे, उतनी पिण्डिका ( देवतास्थापन को पीठिका ) को लेकर देवप्रतिमा की ऊँचाई होती है।
द्वार की ऊँचाई में उसका अष्टमांश घटा कर जो शेष बचे, उतनी पिण्डिका ( देवतास्थापन को पीठिका ) को लेकर देवप्रतिमा की ऊँचाई होती है। पीठिकासहित प्रतिमा की ऊँचाई का तीन भाग करके दो भाग के बराबर ऊँची प्रतिमा और एक भाग के समान पीठिका बनानी चाहिये। यह प्रमाण समस्त प्रासादों में जानना चाहिये।
मेरु, मन्दर, कैलाश, विमानच्छद, नन्दन, समुद्ग, पद्म, गरुड़, नन्दिवर्धन, कुञ्जर, गुहराज,
वृष, हंस, सर्वतोभद्र, घट, सिंह, वृत्त, चतुष्कोण, षोडशाश्रि और अष्टाश्रि
ये बोस प्रासादों के नाम मैंने (वराहमिहिर ने कहे हैं। अब क्रमशः इन प्रासादों के लक्षण कहते हैं।
मेरु' नामक प्रासाद में छः कोण, बारह भूमि, अनेक प्रकार की खिड़कियाँ, चारो दिशाओं में चार द्वार और बत्तीस हाथ के बराबर विस्तार होता है।
'मन्दर' नामक प्रासाद छः कोण वाला, तीस हाथ तुल्य विस्तार वाला, दश भूमि वाला और शिखरों से युक्त होता है। 'कैलाश' नामक प्रासाद शिखरों से युक्त, अट्ठाईस हाथ विस्तार वाला, आठ भूमि वाला और छ: कोण वाला होता है।
'विमान' नामक प्रासाद जालीदार खिड़‌कियों से युक्त, इक्कीस हाथ विस्तार वाला, आठ भूमि वाला और छ: कोण वाला होता है। 'नन्दन' नामक प्रासाद छ: कोण वाला, छः भूमि वाला, बत्तीस हाथ तुल्य विस्तार वाला और सोलह अण्डों (शिखरों) से युक्त होता है।
'समुद्ग' नामक प्रासाद गोल और 'पद्म' नामक प्रासाद कमल की आकृति वाला होता है तथा दोनों एक शृङ्ग तथा एक ही भूमि वाले होते हैं।
'गरुड़' नामक प्रासाद गरुड़ की आकृति का होता है। 'नन्दिवर्धन' नामक प्रासाद भी गरुड़ की आकृति का होता है; किन्तु पं७ तथा पूँछ से रहित होता है तथा ये दोनों ही प्रासाद चौबीस हाथ विस्तार वाले, सात भूमि वाले और चौबीस शिखरों से विभूषित होते हैं।
सोलह हाथ विस्तार वाला होता है। 'गुहराज' प्रासाद गुह की आकृति वाला और सोलह हाथ विस्तार वाला होता है तथा इन दोनों ही प्रासादों का बलभी तीन चन्द्रशालाओं से समन्वित होता है।
'वृष' नामक प्रासाद एक भूमि वाला, एक शृङ्ग वाला, बारह हाथ विस्तार वाला और चारो तरफ से वृत्ताकार होता है। 'हंस' प्रासाद हंस पक्षी की आकृति वाला, बारह हाथ विस्तार वाला, एक भूमि और एक शृङ्ग वाला होता है। 'घट' नामक प्रासाद कलश की आकृति वाला, आठ हाथ विस्तार वाला, एक शृङ्ग और एक भूमि वाला होता है।
'सर्वतोभद्र' नामक प्रासाद चारों दिशाओं में चार द्वारों से युत, अनेक शिखरों से शोभित, अनेक संख्यक सुन्दर चन्द्रशालाओं से शोभित, छब्बीस हाथ विस्तार वाला, चतुष्कोण और पाँच भूमियों से युत होता है।
'सिंह' नामक प्रासाद सिंह की प्रतिमाओं से शोभित, द्वादशास्त्र और आठ हाथ विस्तार वाला होता है। शेष चार प्रासाद (वृत्त, चतुष्कोण, षोडशाश्रि और अष्टानि ) अपने नाम के समान ही आकार वाले और काले होते हैं अर्थात् इनके अन्दर अन्धकार रहता है।
एक भूमि का प्रमाण मय के मतानुसार एक सौ आठ अंगुल और विश्वकर्मा के मतानुसार साढ़े तीन हाथ कहा गया है।
बुद्धिमान् कारीगर मय और विश्वकर्मा - इन दोनों के मतों को एक ही कहते हैं। उनका कहना है कि विश्वकर्मा ने भूमि का प्रमाण कपोतपालिका को छोड़कर कहा है: अतः उसमें कपोतपालिका के प्रमाण चौबीस अंगुल जोड़ देने से मय के प्रमाणतुल्य हो विश्वकर्मा की भी भूमि का प्रमाण हो जाता है।
मैंने संक्षेप से यह प्रासादों का लक्षण कहा है; किन्तु गर्ग मुनि ने इस प्रकरण में जो कुछ कहा है, वे सभी विषय इसमें समाहित हैं। साथ ही मनु आदि । वसिष्ठ, मय और नग्नजित्) आचार्यों ने जो विस्तारपूर्वक कहे हैं, उनकी स्मृति के लिये मैंने यह अधिकार बनाया है।
Krishjan
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