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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 12
विस्तारार्थं भवेद् गर्यो भित्तयोऽन्याः समन्ततः । गर्भपादेन विस्तीर्णं द्वारं द्विगुणमुच्छ्रितम् ॥
विस्तार के आधा गर्भ शेष सब दिशाओं में भीत बनती है। गर्भ के चौथाई के समान द्वार का विस्तार और द्विगुणित विस्तारतुल्य द्वार की ऊंचाई होती है।
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