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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 11
यो विस्तारो भवेद् यस्य द्विगुणा तत्समुन्नतिः । उच्छ्रायाद् यस्तृतीयांशस्तेन तुल्या कटिः स्मृता ॥
देवालय का जितना विस्तार हो, उससे दूनी ऊँचाई और ऊँचाई की तिहाई कटि होती है। सोढ़ी के ऊपर जहाँ से देवालय का प्रारम्भ होता है उसको 'कटि' कहते हैं।
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