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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 24
कुश्वर इति गजपृष्ठः षोडशहस्तः समन्ततो मूलात् । गुहराजः षोडशकस्त्रिचन्द्रशाला भवेद् वलभी ॥
सोलह हाथ विस्तार वाला होता है। 'गुहराज' प्रासाद गुह की आकृति वाला और सोलह हाथ विस्तार वाला होता है तथा इन दोनों ही प्रासादों का बलभी तीन चन्द्रशालाओं से समन्वित होता है।
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