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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 23
गरुडाकृतिश्च गरुडो नन्दीति च षट्चतुष्कविस्तीर्णः । कार्यस्तु सप्तभौमो विभूषितोऽण्डैस्तु विंशत्या ॥
'गरुड़' नामक प्रासाद गरुड़ की आकृति का होता है। 'नन्दिवर्धन' नामक प्रासाद भी गरुड़ की आकृति का होता है; किन्तु पं७ तथा पूँछ से रहित होता है तथा ये दोनों ही प्रासाद चौबीस हाथ विस्तार वाले, सात भूमि वाले और चौबीस शिखरों से विभूषित होते हैं।
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