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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 14
शेषं मङ्गल्यविहगैः श्रीवृक्षैः स्वस्तिकैर्घटैः । मिथुनैः पत्रवल्लीभिः प्रमथैश्चोपशोभयेत् ॥
शाखाओं के तीन-चौथाई भागों को हंस आदि शुभ पक्षी, बेल, स्वस्तिक ( चिह्नविशेष), कलश, स्त्री-पुरुष का जोड़ा, पत्ते और लताओं से शोभित करना चाहिये। द्वार की ऊँचाई में उसका अष्टमांश घटा कर जो शेष बचे, उतनी पिण्डिका ( देवतास्थापन को पीठिका ) को लेकर देवप्रतिमा की ऊँचाई होती है।
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