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बृहत्संहिता • अध्याय 56 • श्लोक 19
तत्र षडश्श्रिर्मेरुर्द्वादशभौमो विचित्रकुहरश्च । द्वारैर्युतश्चतुर्भिर्द्वात्रिंशद्धस्तविस्तीर्णः ॥
मेरु' नामक प्रासाद में छः कोण, बारह भूमि, अनेक प्रकार की खिड़कियाँ, चारो दिशाओं में चार द्वार और बत्तीस हाथ के बराबर विस्तार होता है।
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