चतुःषष्टिपदं कार्य देवतायतनं सदा । द्वारं च मध्यमं तस्मिन् समदिक्स्थं प्रशस्यते ॥
देवालय में सदा पूर्वोक्त चौंसठ पद का वास्तु बनाना चाहिये तथा मध्यम द्वार सब
दिशाओं में स्थित हो तो श्रेष्ठ होता है।
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