Krishjan
🇺🇸 EN
🇮🇳 हिन्दी
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
मुख्य पृष्ठ
शास्त्र
परिचय
ऐप इंस्टॉल करें
अध्याय 19 — अथ प्र अर्षफलाध्यायः
बृहत्संहिता
22 श्लोक • केवल अनुवाद
सूर्य से वर्ष, मास या दिन में पृथ्वी पर सब जगह अल्प धान्य, देववश भक्षण को इच्काने वाले ट्रीगण
सजा दिजन्तुओं से मंगुत वर, नदियों में आय जल, रोग के लिये वीर्यपुत ओषधि का अभाव, शिशिर (माप-फागुन में भी सूर्य का भयङ्कर ताप, पर्वत के समान मेध से भी अधिक वृष्टिका अभाव, आशस्थित नक्षत्र और चन्द्र में दीप्ति का अभाव और गौओं के मुख्य दुःखी होते हैं
संग्राम में हाथी, धोदा, पदातियों से अन्य धनुखद और मुगलों से पुत मन्त्री नादि के साथ होकर राजा सोग देशों का नाश करते हुये विचरण करते हैं।
चन्द्र के वर्ष, मास या दिन में पतित पर्वत, सर्प, कम्बल, भ्रमर और गवत (शुद्ध) के समान निर्मल जाल में पृथ्वीको पूर्ण करते हुये तथा विदो
विदो जनों के ओक्यक गौरवपुरनियों से दिशाओं को पूर्ण करते हुये मेधों से आच्यादित आकाश, कमल और कुमुदसेलच और शब्दायमान
कमल और कुमुदसेलच और शब्दायमान भ्रमरों से पुत्र स्वर, अधिक दूध देने बाली गी, नेत्रों से सुन्दरी खी (सिन्तर अपने पति को आनन्द देने वाली), साठी, और अার स्थानों से बुड, अग्नि स्थानों से व्याप्त था यह और (पुदि से अन्बिर पृथ्वी राजा में परिचालित होती है।
मङ्गल के संवत्सर, मास या दिन में वायु से सञ्चालित ग्राम, वन और नगरों को दग्ध करने की इच्छा रखने वाली भयङ्कर अग्नि चलती है। चोरों से निर्धन किये हुये पीड़ित मनुष्यगण हाहाकार करते हैं
आकाश में संगठित मूर्ति वाले मेघ कहीं भी अधिक वृष्टि नहीं करते। निम्न स्थान में उत्पन्न धान्य सूख जाते हैं तथा पके हुये धान्य भी वज्रपात आदि उत्पातों से नष्ट हो जाते हैं।
राजा लोग धर्मपालन में तत्पर नहीं रहते हैं। पैत्तिक रोगों की अधिकता होती है। सपों से लोगों को पीड़ा होती है। इस तरह मङ्गल के स्वामित्व में प्रजागण पीड़ित और धान्यों का नाश होता है।
बुध के वर्ष, मास या दिन में प्रों में कुल, इन्द्रजाल विद्या को जानने बाले, माइयं देखने वाले, अर्थात्तस्थान को जानने वाले, नगरों में रहने वाले, गान विद्या बानने बाले, लेखक, गणित और अख किया जाने वाले उतिपुत होते हैं।
राजा लोग पास्यर प्रीति बढ़ाने की इच्छा से आर्यजनक और हौत्पादक द्रव्य परस्पर एक-दूसरे को देने की इच्छा करते हैं। वार्ता कृति और वाणिज्य) अति (स) होती है। क्यों (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) का अत्यधिक पात होता है
कोई अध्यात्म विद्या (योग) में और कोई आन्वीक्षिकी (सर्वविद्या में विरत होते हैं। हारयज्ञ, दूत, कवि, चालक, नपुंसक, कि, सेतु (स्थल), जल और पर्वत पर निवास करने वाले प्रात्र होते हैं तथा पृथ्वी पर औषधियों की अधिकता होती है।
गुरु के शुभ वर्ष, मास या दिन में यज्ञों में रात्रिवर्जित काल में श्रेष्ठ ब्राह्मण से उच्चरित, विस्तीर्ण, स्वर्ग तक पहुँचने वाली, यज्ञ में विघ्न करने वाले राक्षसों के मन को भेदन करने वाली और इन्द्रादि के मन को प्रसन्न करने वाली वेदध्वनि होती है।
राजाओं से अच्छी तरह परिरक्षित, उत्तम धान्य, बहुत हाथी, पदाति, घोड़ा, धन और विस्तृत गोकुलों से पृथ्वी परिपूर्ण होती है। देवता के समान मनुष्य होते हैं।
सदा भूमि को जल से परिपूर्ण करते हुये उन्नत, विविध मेघों से आकाश व्याप्त होता है तथा बहुत तरह के धान्य और समृद्धि से युत पृथ्वी होती है।
शुक्र के वर्ष, भारा या दिन में शशाली और इक्षु (खगया) से युत, पर्वत के सभान येथों की गिरे हुये जल से परिपूर्ण बाली सुन्दर कमल और जल से परिपूर्ण
खासे विविधयों से पुर पुरी सम्पूर्ण भूपों से युत श्री की तरह शोभित होती है। सुभ्वी पर सत्रुके बहुत रोयों को करने में उद्घोषित जस से अभी दिशाओं को पूर्ण करने वाले राजवर्ग होते हैं
आनन्दपुर सरगण, निह दुई और अत्यतिमाओं से है। यदि बकरी है, और मुदती है, अभ्या भित्र और बन्धुओं के साथ कारभा
शनि के वर्ष, मास या दिन में चोरों से सम्बन्धित युद्धों से व्याप्त, पशु और पानों से रहित, संग्राम में बन्धुजनों के मरण से बार-बार रोते हुये वंशों से युत, प्रधान रोग तथा क्षुधा से ब्याकुल राष्ट्र होते
हैं, वायु से उड़ाये गये मेषों से रहित आकाश होता है, अनेक तरह से नष्ट वृक्षों से युत पृथ्वी होती है, सूर्य और चन्द्रकिरणों से रहित आकाश होता है, पूलियों से स्थगित बापी, कूप और तालाब होते हैं
सूर्य और चन्द्रकिरणों से रहित आकाश होता है, पूलियों से स्थगित बापी, कूप और तालाब होते हैं तथा नदियों में अत्यन्त कम जल होता है। इन्द्र अल्प वर्षा करता है, इसलिये कहीं-कहीं पर जल के विना धान्य नष्ट हो जाते हैं
जो ग्रह सूक्ष्म, अस्पष्ट किरण वाला, नीच स्थानस्थित या ग्रहयुद्ध में पराजित हो, यह सम्पूर्ण फल देने वाला नहीं होता है। इससे विपरीत लक्षणयुत होने से सम्पूर्ण फल देने वाला होता है। अशुभ वर्ष में रवि, मंगल और शनि के अशुभ मासफल की वृद्धि होती है। इससे यह सिद्ध होता है कि अशुभ ग्रह के वर्ष में अशुभ ग्रह का मासाधिपतित्व होने पर अत्यन्त अशुभ फल होता है तथा वर्षाधिप, मासाधिप-दोनों शुभग्रह हों तो शुभ फल की वृद्धि और एक शुभ एवं दूसरा अशुभ हो तो याप्य (अल्प फल ) होता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें