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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 7
वातोद्धतश्चरति वह्रिरतिप्रचण्डो ग्रामान् वनानि नगराणि च सन्दिधक्षुः । हाहेति दस्युगणपातहता रटन्ति निःस्वीकृता विपशवो भुवि मर्त्यसङ्घाः ॥
मङ्गल के संवत्सर, मास या दिन में वायु से सञ्चालित ग्राम, वन और नगरों को दग्ध करने की इच्छा रखने वाली भयङ्कर अग्नि चलती है। चोरों से निर्धन किये हुये पीड़ित मनुष्यगण हाहाकार करते हैं
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