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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 4
व्याप्तं नभः प्रचलिताचलसप्रिकाशै यर्थ्यालाधनालिगवलच्छविधिः पयोदैः । गां पूरयन्जिरखिलायमलाभिरद्धि- रुत्कण्ठितेन गुरुणा ध्वनितेन धाशाः ॥
चन्द्र के वर्ष, मास या दिन में पतित पर्वत, सर्प, कम्बल, भ्रमर और गवत (शुद्ध) के समान निर्मल जाल में पृथ्वीको पूर्ण करते हुये तथा विदो
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