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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 17
क्षत्रं क्षिती क्षपितभूरिवलारिपक्ष- मुट्‌पुटनैकजयशब्दविराविताशम् । संहष्टशिष्टजनदुष्टविनष्टवर्गा गां पालयन्यवनिपा नगराकराढ्याम् ॥
खासे विविधयों से पुर पुरी सम्पूर्ण भूपों से युत श्री की तरह शोभित होती है। सुभ्वी पर सत्रुके बहुत रोयों को करने में उद्घोषित जस से अभी दिशाओं को पूर्ण करने वाले राजवर्ग होते हैं
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