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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 15
विविर्धर्वियदुन्नतैः पयोदैर्वृतमुर्वी पयसाभितर्पयद्भिः । सुरराजगुरोः शुभे तु वर्षे बहुसस्या क्षितिरुत्तमर्द्धियुक्ता ॥
सदा भूमि को जल से परिपूर्ण करते हुये उन्नत, विविध मेघों से आकाश व्याप्त होता है तथा बहुत तरह के धान्य और समृद्धि से युत पृथ्वी होती है।
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