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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 22
वर्षफलविशेषप्रदर्शनार्थमाह अणुरपटुमयूखो नीचगोऽन्यैर्जितो वा न सकलफलदाता पुष्टिष्टोऽतोऽन्यथा यः । यदशुभमशुभेऽब्दे मासजं तस्य वृद्धिः शुभफलमपि चैवं याप्यमन्योन्यतायाम् ॥
जो ग्रह सूक्ष्म, अस्पष्ट किरण वाला, नीच स्थानस्थित या ग्रहयुद्ध में पराजित हो, यह सम्पूर्ण फल देने वाला नहीं होता है। इससे विपरीत लक्षणयुत होने से सम्पूर्ण फल देने वाला होता है। अशुभ वर्ष में रवि, मंगल और शनि के अशुभ मासफल की वृद्धि होती है। इससे यह सिद्ध होता है कि अशुभ ग्रह के वर्ष में अशुभ ग्रह का मासाधिपतित्व होने पर अत्यन्त अशुभ फल होता है तथा वर्षाधिप, मासाधिप-दोनों शुभग्रह हों तो शुभ फल की वृद्धि और एक शुभ एवं दूसरा अशुभ हो तो याप्य (अल्प फल ) होता है।
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