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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 12
हास्यज्ञदूतकविबालनपुंसकानां युक्तिज्ञसेतुजलपर्वतवासिनां हार्दि करोति मृगताञ्छननः स्वकेऽब्दे मासेऽथवा प्रचुरता भुवि चौषधीनाम् ॥
कोई अध्यात्म विद्या (योग) में और कोई आन्वीक्षिकी (सर्वविद्या में विरत होते हैं। हारयज्ञ, दूत, कवि, चालक, नपुंसक, कि, सेतु (स्थल), जल और पर्वत पर निवास करने वाले प्रात्र होते हैं तथा पृथ्वी पर औषधियों की अधिकता होती है।
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