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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 20
वातोद्धताम्बुधरवर्जितमन्तरिक्ष- मारुग्णनैकविटपं च घरातलं द्यौः । नष्टार्कचन्द्रकिरणातिरजोऽवनद्धा तोयाशयाश्च विजलाः सरितोऽपि तन्व्यः ॥
हैं, वायु से उड़ाये गये मेषों से रहित आकाश होता है, अनेक तरह से नष्ट वृक्षों से युत पृथ्वी होती है, सूर्य और चन्द्रकिरणों से रहित आकाश होता है, पूलियों से स्थगित बापी, कूप और तालाब होते हैं
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