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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 2
तीक्ष्णं तपत्यदितिमः शिशिरेऽपि काले नात्यम्बुदा जलमुधोऽचलसत्रिकाशाः । नष्टप्रभक्षगणशीतकर सीदन्ति तापसकुलानि सगोकुलानि ॥
सजा दिजन्तुओं से मंगुत वर, नदियों में आय जल, रोग के लिये वीर्यपुत ओषधि का अभाव, शिशिर (माप-फागुन में भी सूर्य का भयङ्कर ताप, पर्वत के समान मेध से भी अधिक वृष्टिका अभाव, आशस्थित नक्षत्र और चन्द्र में दीप्ति का अभाव और गौओं के मुख्य दुःखी होते हैं
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