मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 11
वार्ता जगत्यवितथा विकाला प्रयो च सम्यक् चरत्यपि मनोरिव दण्डनीतिः । अध्यक्षरस्वभिनिविष्टाधियोऽपि केचि दान्यीक्षिकीषु च परं पदघीहमानाः ॥
राजा लोग पास्यर प्रीति बढ़ाने की इच्छा से आर्यजनक और हौत्पादक द्रव्य परस्पर एक-दूसरे को देने की इच्छा करते हैं। वार्ता कृति और वाणिज्य) अति (स) होती है। क्यों (ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद) का अत्यधिक पात होता है
पूरा ग्रंथ पढ़ें
बृहत्संहिता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

बृहत्संहिता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें