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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 8
अभ्युन्नता वियति संहतमूर्तयोऽपि मुञ्चन्ति कुत्रचिदपः प्रचुरं पयोदाः । सीम्नि प्रजातमपि शोषमुपैति सस्यं निष्पन्नमप्यविनयादपरे हरन्ति ॥
आकाश में संगठित मूर्ति वाले मेघ कहीं भी अधिक वृष्टि नहीं करते। निम्न स्थान में उत्पन्न धान्य सूख जाते हैं तथा पके हुये धान्य भी वज्रपात आदि उत्पातों से नष्ट हो जाते हैं।
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