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बृहत्संहिता • अध्याय 19 • श्लोक 21
जातानि कुत्रचिदतोयतया विनाश- मृच्छन्ति पुष्टिमपराणि जलोक्षितानि । सस्यानि मन्दमभिवर्षति वृत्रशत्रु- वर्ष दिवाकरसुतस्य सदा प्रवृत्ते ॥
सूर्य और चन्द्रकिरणों से रहित आकाश होता है, पूलियों से स्थगित बापी, कूप और तालाब होते हैं तथा नदियों में अत्यन्त कम जल होता है। इन्द्र अल्प वर्षा करता है, इसलिये कहीं-कहीं पर जल के विना धान्य नष्ट हो जाते हैं
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