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अध्याय 2 — द्वितीय अंक
अभिज्ञानशाकुन्तलम्
19 श्लोक • केवल अनुवाद
विदूषक:-- (लम्बी सांस लेकर) हे दुर्भाग्य, मृगया (शिकार खेलने) के व्यसनी इस राजा (दुष्यन्त) की मित्रता (वयस्यभाव) से मैं खिन्न हो गया हूं । यह मृग (जा रहा है); यह सूअर (जा रहा है); यह शेर (जा रहा है); इस प्रकार (चिल्लाते हुये) दोपहर में भी गर्मी के कारण विरली वृक्ष-छाया वाले वनप्रदेशो में एक वन से दूसरे वन पे घूमना (भटकना) पड़ता है । (गिरकर सडे हुये पत्तो) के मिश्रण से कड़वा (कसला) तथा कुछ-कुछ गर्म (कदुष्ण) पहाड़ी नदियों का जल पीना पड़ता है । (एक तो) अनिश्चत समय में (और उसमे भी) ऐसा भोजन करना पड़ता है, जिसमे (तप्त) लोह-शलाका (कांटा) पर भने भुने मांस की (ही) अधिकता होती है । घोड़ा दौड़ाने से (हड्डियों के) जोड़ों के हिल जाने से (उत्पन्न पीड़ा के कारण) रात्रि मे भी (मुझे) पर्याप्त सोने को नहीं मिलता । फिर भी (आज तो) बहुत सबेरे ही नीच (दासी के पुत्रौ) बहेलियों (शिकारियो) द्वारा जंगल को घेरने के कोलाहल से जगा दिया गया हूं । इतना होने पर भी अभी पीड़ा (की परम्परा) समाप्त नहीं हो पायी है । अब यह और फोडे पर फोड़ा हो गया है (अर्थात् कष्ट के ऊपर दूसरा कष्ट आ गया है) । (क्योकि) कल हम लोगों के पीछे छूट जाने पर हरिण का पीछा करते-करते तपोवन में प्रविष्ट हुये पूज्य महाराज को, मेरे दुर्भाग्य से तपस्विकन्या शकुन्तला दृष्टिगोचर हो गयी । इस समय (वे) नगर जाने की किसी प्रकार भी इच्छा (मन) नहीं कर रहे हैँ । आज भी (रातभर) उसी (शकुन्तला) के (विषय में) सोचते-सोचते (उनकी) आंखो के सामने (अर्थात् जागते-जागते) सवेरा हो गया । क्या उपाय है (अर्थात् अब मैं क्या करू) ? तब तक (स्नानादि) दैनिक कार्यो से निवृत्त हुये उन से (राजा द्ष्यन्त से) मिलता हूं । (घूमकर और देखकर) हाथ में धनुष ली हई र वनपुष्पों की माला पहनी हई इन यवनियों (परिचारिकाओ) से घिरे हुये मेरे प्रिय मित्र (राजा दुष्यन्त) इधर ही आ रहे हैं । अच्छा, अङ्ग-भङ्ग से व्याकुल-सा होकर (यहां ही) खड़ा होता हूं । सम्भव है, इसी प्रकार (मुझे कुछ) विश्राम मिल जाये । (लकड़ी के डंडे का सहारा लेकर खडा हो जाता है) । (तत्पश्चात् निर्दिष्ट रूप में राजा प्रवेश करता है) राजा:-- (अपने मन में) यद्यपि प्रिय (शकुन्तला) सरलता से प्राप्त होने योग्य नहीं है, तथापि (मेरा) मन उसके प्रेमयुक्त भावों (चेष्टाओं) को देखकर आश्वस्त ( सन्तुष्ट) है । (क्योकि) कामदेव (कामभाव) के सफल न होने पर भी दोनों (प्रेमी एवं प्रेमिका) की (परस्पर) अभिलाषा प्रेम (प्रीति) को उत्पन्न करती है ।
दूसरी ओर अपने नेत्र को प्रेरित करती हुई (अर्थात् दृष्टि डालती हुई) भी उसने (शकुन्तला ने) जो प्रमपूर्वक (मुझे) देखा, नितम्बो के भारी होने के कारण मानो लीलापूर्वक जो धीरे-धीरे गयी, प्रियंवदा के द्वारा मत जाओ ऐसा (कहकर) रोके जाने पर उसने (शकुन्तला ने) अपनी सखी (प्रियंवदा) को भी जो कुछ क्रोधपूर्वक कही (अर्थात्) अपनी सखी प्रियंवदा को जो क्रोधपूर्वक कहा; वह सब कुछ निश्चय ही मुझे लक्षय करके (अर्थात् मेरे लिये ही) (किया गया था) । अहो कामी (प्रेमासक्त) व्यक्ति (सर्वत्र) अपनी ही बात देखता है ।
विदूषक:-- (उसी प्रकार खड़ा होकर ही) हे मित्र, मेरे हाथ-पैर नहीं फैल (चल) रहे हैं । इसलिए वचन-मात्र से (अर्थात् सीधा खडा होकर हाथ उठाये बिना केवल वाणी से ही) (आप की) जय बोलता हूं । जय हो, आप की जय हो । राजा:-- यह अंग-भंग कैसे हआ ? विदूषक:-- क्यों, स्वयं आंख को व्याकुल करके (अर्थात् आंख मे उंगली डालकर) आप आंसुओं का कारण पूछ रहे हैं ? राजा:-- मैं (तुम्हारी बात) नहीं समझ पा रहा हूं । विदूषक:-- हे मित्र, बेंत जो कुबड़े की लीला (अर्थात् टेढ़ा होने की चेष्टा) का अनुकरण करता है, क्या वह अपने प्रभाव से? अथवा नदी के वेग के (प्रभाव से वैसा करता है) ? राजा:-- उसमे नदी का वेग कारण है । विदूषक:-- मेरे (कुबड़े की भाँति झुक जाने में) भी आप (कारण हैं) । राजा:-- कैसे ? विदूषक:-- इस प्रकार राज-कार्यो को छोडकर ऐसे (हंसक जन्तु से) (भरे हुये) दुर्गम (बीहड़) प्रदेश में जंगली लोगों (वनचर) की भाँति आप का रहना क्या उचित है ? यह सच है कि (वास्तविकता यह है) प्रतिदिन जंगली जानवरों को भगाने (पीछा करने) से ढीले पड़े अंगो के जोड़ वाले (अपने) शरीरावयवों का मैं अब स्वामी नहीं रह गया हूं (अर्थात् मेरे ऊपर कृपा कीजिये) । एक दिन भी तो विश्राम कीजिये । राजा:-- (अपने मन में) यह (विदूषक) इस प्रकार कह रहा है । मेरा मन कण्व-पुत्री (शकुन्तला) की स्मृति में शिकार खेलने (मृगया) से उदासीन (विक्लव) (हो रहा है) क्योकि चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा तथा चढ़े हुये बाण वाले इस धनुष को (उन) हरिणो पर चलाने मे मैं समर्थ नहीं हूं , जिन्होने (मेरी) प्रियतमा (शकुन्तला) के सहवास को प्राप्त कर (अर्थात् शकुन्तला के साथ रहकर) मानो (उस शकुन्तला को) भोलेपन से देखने का उपदेश किया है ।
विदूषक:-- (राजा के मुख को देखकर) आदरणीय ! आप कुछ मन में रख कर विचार कर रहे हैं । (लगता है) मेरे द्वारा अरण्यरोदन (ही) किया गया (अर्थात् मैने व्यर्थ ही आप से विश्राम करने के लिए प्रार्थना की) | राजा:-- (मुस्कराहट के साथ) (मन में) दूसरा क्या (विचार करुंगा) । मेरे लिये (अपने) मित्र का वचन अनुल्लद्धनीय है (अर्थात् मैं मित्र के वचन का उलंघन नहीं कर सकता हूँ) । इसीलिये (शिकार खेलने से) विरत हो गया हूँ । विदूषक:-- आप चिरंजीवी हों । (जाना चाहता है) राजा:-- हे मित्र, रुको । (अभी) मेरी बात अधूरी ही है । विदूषक:-- आप आज्ञा दीजिये । राजा:-- विश्रान्त होने पर (विश्राम के बाद) आप को मेरे भी एक सरल (सुसाध्य) कार्य में सहायक होना है । विदूषक:-- क्या लड्डू तोडने (खाने) में ? तो यह सुअवसर (निमंत्रण) शिरोधार्य (सहर्ष स्वीकार) है । राजा:-- जहां (अर्थात् जिस कार्य के विषय में) मैं कहूंगा (उसमे आपको मेरी सहायता करनी है) । अरे; कौन (है), कौन (है) यहाँ ? दारपाल (प्रवेश करके):-- (प्रणाम करके) स्वामी आज्ञा दें । राजा:-- रैवतक, सेनापति को बुलाओ । द्वारपाल:-- (ठीक है, मैं) वैसा (ही करता हूँ ) । (निकल कर सेनापति के साथ फिर प्रवेश कर) आज्ञा देने के लिए उत्कण्ठित ये स्वामी इधर ही दत्तदृष्टि (आंख लगाये हुये) बेठे हैं । आप (उनके) समीप चलें । सेनापति:-- (राजा को देखकर) दोषग्रस्त मृगया (शिकार) भी महाराज के लिये केवल गुण (स्वरूप) ही हो गयी है । क्योकि महाराज पर्वत पर विचरण करने वाले हाथी की भाँति (महाराज) निरन्तर धनुष की डोरी (प्रत्यञ्चा) के खींचने से कठोर अग्रभाग वाले (अर्थात् जिसका अगला भाग धनुष की डोरी खींचने से कठोर हो गया हो ऐसे), सूर्य के ताप को सहन कर लेने वाले (अर्थात् जो सूर्य की किरणों को सहन कर लेने वाला है ऐसे), पसीने की बंद से रहित तथा कृश होते हुए भी विशालता (अर्थात् लम्बा-चोडा होने) के कारण (कृश) न दिखायी पड़ने वाले, अत्यन्त बल से युक्त शरीर को धारण करते हैं ।
(समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो, जय हो । हिंसक पशुओं (का आवास) जंगल घेर लिया गया है । (अभी तक) आप अन्यत्र (वन से दूर) क्यो ठहरे (रुके) हैं ? राजा:-- मृगया (शिकार खेलने) की निन्दा करने वाते माधव्य के द्वारा (मृगया के प्रति मेरा) उत्साह मन्द कर दिया गया है । सेनापति:-- (हाथ की ओट में) हे मित्र, दृढ़ आग्रह (प्रतिबन्ध) वाले होओ (अर्थात् अपने आग्रह पर अड़े रहना) । तब तक की महाराज की इच्छा (चित्तवृति) का अनुसरण करता हूँ । (प्रकट रूप से) यह मूर्ख (वैधेय) बका करे । (इस विषय में) तो स्वामी ही प्रमाण (निदर्शन) हैं । (शिकार खेलने से) चर्बी कम हो जाने के कारण पतले उदर वाला शरीर चुस्त और अध्यवसाय (परिश्रम) करने के योग्य हो जाता है । प्राणियों (जीवो) के भय और क्रोध की (स्थिति) में (उनके) विकृत (क्षुब्ध) मन का भी ज्ञान हो जाता है। धनुर्धारियों (धनुर्धारी योद्धाओं) के लिये यह गौरव का विषय है कि चलते-फिरते लक्ष्य पर (भी उनके) बाण सफल हो जाते हैं । लोग मृगया (शिकार) को व्यर्थ में ही व्यसन (दुर्गुण) कहते हैं । इस प्रकार का मनोरंजन (अन्यत्र) कहाँ (हो सकता है ) ?
विदूषक:-- (क्रोधपूर्वक) अरे उत्साह दिलाने वाले, दूर हट । आदरणीय महाराज (अपनी) स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गये हैं । तू तो एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमता हआ मनुष्य की नाक के लालची किसी बूढ़े रीछ के मुंह में गिर पड़ेगा । राजा:-- भद्र सेनापति, (हम लोग) आश्रम के समीप रुके हैं । इस लिये तुम्हारे वचन का अभिनन्दन नहीं करता हूँ (अर्थात् तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ ।) आज तो भैंसे सीगों से पुनः पुनः उछाले गये तालाब के जल में स्नान करें । छाया में झुंड (कदम्बक) बनाकर स्थित मृगसमूह जुगाली का अभ्यास करें । सूअरों की पंक्तियां (सूकरसमूह) निर्भय होकर पोखरो (जंगली गड्डो) में नागरमोथा को उखाडे । यह हमारा धनुष भी शिथिल डोरी (प्रत्यञ्चा) वाला होकर विश्राम को प्राप्त करे ।
सेनापति:-- जो महाराज को अच्छा लगे (वही होगा) । राजा:-- पहले (भेजे) गये हुए वन घेरने वालों को लोटा लो । जिस प्रकार मेरे सैनिक तपोवन में विघ्न न करें, वैसा उन्हे रोक दो (अर्थात् सैनिकों को आदेश दे दो कि वे तपोवन में कोई विघ्न न पैदा करें) । देखो शान्तिप्रधान तपस्वियों में भस्म कर देने वाला गुप्त (छिपा ह॒आ) तेज रहता है, क्योंकि स्पर्श करने योग्य सूर्यकान्त मणियों के समान (वे तपस्वी) दूसरे के तेज से तिरस्कृत होने पर (अपने) उस (तेज) को प्रकट करते हैं ।
सेनापति:-- महाराज जो आज्ञा देते हैं (कार्य उसी के अनुसार होगा) । विदूषक:-- तुम्हारी (मृगया के प्रति) उत्साह की बातें नष्ट हों । (सेनापति निकल जाता है) । राजा:-- (सेवक-वर्ग को देखकर) आप लोग मृगया (शिकार खेलने) के वेष को उतार दें । रैवतक, तुम भी अपने काम (नियोग) को पूरा (अशन्य) करो। सेवकवर्ग:-- स्वामी जो आज्ञा देते हैं (स्वामी की जो आज्ञा) । (निकल जाते हैं) | विदूषक:-- आपने (इस स्थान को) मक्षिकाशून्य (एकान्त) बना दिया । अब आप वृक्ष की छाया से निर्मित वितान से युक्त इस शिला-खण्ड पर बैठें, जिससे मैं भी सुखपूर्वक बैठ जाऊँ । राजा:-- आगे चलो । विदूषक:-- आप आईये (दोनो घूमकर बैठ जाते हैं) । राजा:-- माधव्य, तुमने नेत्रों का फल नहीं पाया, क्योकि तुमने देखने योग्य वस्तु नहीं देखी । विदूषक:-- (नेत्रों का फल) क्यों नहीं (पाया) ? आप तो मेरे सामने (ही) हैं । राजा:-- सभी लोग अपने व्यक्ति को सुन्दर समझते हैं । मैं तो आश्रम की अलङ्कारभूत उस शकुन्तला को लक्ष्य करके कह रहा हूँ । विदूषक:-- (अपने मन में) अच्छा, (मैं) इनको अवसर नही दूंगा । (प्रकट रूप में) हे मित्र, तुम तपस्वी की कन्या के इच्छुक दिखायी दे रहे हो । राजा:--- हे मित्र, परित्याज्य वस्तु पर पुरुवंशियो का मन प्रवृत नहीं होता है । शिथिल (होने के कारण) मन्दार (वृक्ष) के ऊपर गिरे हुये चमेली के पुष्प की भाँति वह मुनि की सन्तान (शकुन्तला) निश्चय ही अप्सरा (मेनका) की पुत्री है (और मेनका द्वारा) छोड़ी जाने पर (मुनि कण्व को) प्राप्त हुई है ।
विदूषक:-- (हंसकर) जिस प्रकार पिण्ड खजूर (उत्तम कोटि के खजूर खाने) से ऊबे हुए किसी व्यक्ति की इमली (तिन्तिणी) के खाने में इच्छा होती है, उसी प्रकार स्री-रत्नों का उपभोग करने वाले आपकी यह इच्छा है । राजा:-- अभी तुमने इस (शकुन्तला) को देखा नहीं है, जिससे ऐसा कह रहे हो । विदूषक:-- निश्चय ही वह रमणीय होगी जो आप को भी आश्चर्ययुक्त कर रही है । राजा:-- मित्र, अधिक (कहने) से क्या ? विधाता (ब्रह्म) की सृष्टिशक्ति (निर्माण-सामर्थ्य) और उस (शकुन्तला) के शरीर को विचार करके मुझे वह (शकुन्तला) विधाता के द्वारा चित्र में बनाकर (तब उसमे) प्राणों का सञ्चार कर (जीवन डालकर) मानो मन के द्वारा सोन्दर्य-समूह से निर्मित (बनायी गयी) विलक्षण (अद्वितीय) स्रीरत्न की रचना प्रतीत होती है ।
विदूषक:-- यदि ऐसा है (तो) अब सभी रूपवती स्त्रीयों की निराकृति है अर्थात् शकुन्तला से (उसके लावण्य के कारण) सभी सुन्दरियां तिरस्कृत हो गयीं । राजा:-- और मेरे मन में यह आता है कि उस (शकुन्तला) का निष्कलंक सौन्दर्य (रूप) (किसी के भी द्वारा) न सूंघा गया फूल है, नखुनो से अछिन्न नवपल्लव है, न बिंधा हुआ (अक्षत) रत्न है, जिसके रस को नहीं चखा गया है ऐसा नया (ताजा) मधु है और पुण्य के (अक्षत सम्पूर्ण) फल के समान है । विधाता यहाँ किस भोक्ता को उपस्थित करेगा (अर्थात् किसको उसका उपभोक्ता बनायेगा) मैं (यह) नहीं जान पा रहा हूँ ।
विदूषक:-- तब आप इसको शीघ्र बचायें । (जिससे यह) इङ्कदी के तेल से चिकने शिर वाले किसी तपस्वी के हाथ में न पड़ जाए । अर्थात् अपात्र के हाथ में जाने के पूर्व उसे अपना लो । राजा:-- निश्चय ही वह (शकुन्तला) पराधीन है । और उसके पिता (कण्व) यहाँ (आश्रम में) विद्यमान नहीं है । विदूषक:-- अच्छा, आप के प्रति उसकी प्रेम-दृष्टि कैसी है ? राजा:-- तपस्विकन्यायें स्वभाव से ही अप्रगल्भ (भोली-भाली) होती हैं । तो भी मेरे सामने पड़ने पर (वह अपनी) दृष्टि हटा लेती थी (अर्थात् वह आंखों को नीचे कर लेती थी), किसी अन्य कारण को लेकर हंस देती थी (हंस पड़ती थी) इसलिये उस के द्वारा विनय (शील) के द्वारा व्यापार (चेष्टा) विहीन (अपने) (प्रेमभाव) को न प्रकट किया गया और न ही छिपाया गया ।
विदूषक:-- तो (क्या) देखते हो तुम्हारी गोद में नहीं बैठ जाती ? राजा:-- (सखियों के) साथ प्रस्थान करते समय उस (शकुन्तला) के द्वारा शालीनता से भी (मेरे प्रति) भली-भाँति प्रेम-भाव प्रकट (आविष्कृत) कर दिया गया । क्योकि (वह) कृशाङ्गी (पतले शरीर वाली) (शकुन्तला) कुछ ही पग चलकर अकारण (अवसर न होने पर) भी कुश के अङ्कुर (नोक) से (मेरा) पैर क्षत (घायल) हो गया है यह कहकर खड़ी हो गयी (रुक गयी) और वृक्षो की शाखाओं (टहनियो) मे न फंसे हुए भी वत्कल वस्त्र को छुडाती हुई (मेरी ओर) मुंह घुमाकर खड़ी हो गयी ।
विदूषक:-- तब तो आप पाथेय (मार्ग का भोजन इत्यादि) ग्रहण कीजिए (और प्रेम पथ के पथिक बन जाइए) । आपके द्वारा तपोवन क्रीडा-वाटिका कर दिया गया है - यह मैं देख रहा हूँ । राजा:- - मित्र, कुछ तपस्वियों के द्वारा मैं पहचान लिया गया हूँ । तो सोचो कि किस बहाने से फिर आश्रम में चला जाए ? विदूषक:-- आप (जैसे) राजाओं के लिये दूसरा क्या बहाना चाहिये । (आप जाकर इस प्रकार कहें कि तपस्वी लोग) हमें नीवार (जंगली धान) का छठा भाग (कर के रूप में) दें । राजा:-- मूर्ख, ये तपस्वी लोग दूसरी ही वस्तु कर के रूप में देते हैं, जो रत्नों की राशि (ढेर) को छोड़कर भी सहर्ष स्वीकार (अभिनन्दन) की जाती है । देखो राजाओं को (ब्राह्मणादि चारो) वर्णों से जो धन (कर के रूप में) प्राप्त होता है, वह नश्वर है (नष्ट हो जाता है) । (किन्तु) तपस्वी लोग हम लोगों को निश्चय ही तपस्या के छठे भाग को देते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होता ।
(नेपथ्य में) ओह, हम कृतार्थ हो गये । राजा:-- (कान लगाकर) अरे, गम्भीर और शान्त स्वर वाले तपस्वियों को होना चाहिये (अर्थात् गम्भीर और शान्त स्वर से ज्ञात होता है कि ये तपस्वी हैं) । द्वारपाल (प्रवेश करके):-- जय हो, महाराज की जय हो । ये दो ऋषिकुमार द्वार पर उपस्थित हैं । राजा:-- तो अविलम्ब उनको प्रवेश कराओ । द्वारपाल:-- अभी प्रवेश कराता हूँ । (निकलकर और ऋषिकुमारों के साथ प्रवेश करके) इधर से, इधर से आप लोग (आवें) । (दोनों राजा को देखते हैं) । प्रथम:-- अहो, इसके (राजा के) कान्तिमान (तेजस्वी) शरीर की विश्वसनीयता! अर्थात् तेजस्वी होने पर भी इसका शरीर विश्वास उत्पन्न कर रहा है । अथवा ऋषियों के तुल्य इस राजा के विषय में यह उचित है । क्योकि इन (राजा) के द्वारा भी सभी के द्वारा आश्रयणीय (गृहस्थ) आश्रम में निवास स्वीकार किया गया है । (प्रजा की) रक्षा करने से यह (राजा) भी प्रतिदिन तपस्या का सञ्चय करता है । जितेन्द्रिय इस (राजा) का भी केवल राजपूर्वक (अर्थात् राज शब्द पूर्व में है जिसके ऐसा) पवित्र ऋषि (राजर्षि) - यह शब्द चारणयुगल के द्वारा गाया जाता हुआ बार-बार स्वर्ग का स्पर्शं करता है अर्थात् स्वर्ग में व्याप्त हो जाता है ।
द्वितीय:-- गोतम, ये वही इन्द्र के मित्र दुष्यन्त हैँ ? प्रथमः-- ओर क्या । द्वितीयः-- इसी से तो नगर के द्वार की अर्गला के समान विशाल भुजाओं वाला यह (राजा दुष्यन्त) अकेला (ही) समुद्ररूप श्याम वर्ण की सीमावाली सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन करता है - यह आश्चर्य की बात नहीं है । क्योंकि राक्षसो के साथ बंधे (ठने) हुए वैर वाले (शत्रुता रखने वाले) देवता युद्धो मे इस (राजा दुष्यन्त) के चढ़ी हुई प्रत्यञ्चा वाले धनुष और इन्द्र के वज्र पर विजय की आशा करते (रखते) हैं । अर्थात् युद्ध में इस राजा के धनुष तथा इन्द्र के वज्र की सहायता से ही अपनी विजय की अपेक्षा करते हैं ।
दोनों:-- (समीप जाकर) राजन् , आपकी विजय हो । राजा:-- (आसन से उठकर) आप दोनों को प्रणाम करता हूँ । दोनों:-- आप का कल्याण हो। (फलों को देते हैं) । राजा:-- (प्रणाम पूर्वक स्वीकार कर) (आप लोगों से) आज्ञा देने की इच्छा करता हूँ (अर्थात् आप लोग आज्ञा दें, क्या कार्य है) । दोनों:-- आप यहाँ हैं, (यह) आश्रमवासियों को ज्ञात हो गया है । अतः वे आपसे प्रार्थना करते हैं । राजा:-- वे क्या आज्ञा देते हैं ? दोनों:-- पूज्य महर्षि कण्व की असमीपस्थता (अनुपस्थिति) के कारण राक्षस हमारे यज्ञ में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं । इसलिए कुछ रात्रि (अर्थात् कुछ दिन) सारथि के साथ (रहकर) आश्रम को सनाथ कीजिये (अर्थात् आश्रम की रक्षा कीजिये) । राजा:-- मैं अनुगृहीत हूँ । विदूषक:-- (एक ओर होकर) यह प्रार्थना अब (तो) आप के अनुकूल (ही) है । राजा:-- (मुस्कुरा कर) रैवतक, मेरे आदेश से सारथि से कहो 'धनुष' के साथ (मेरा) रथ उपस्थित करो । दवारपाल:-- जो महाराज आज्ञा दे रहे हैं (वहीं करूंगा) । (निकल जाता है) । दोनों (प्रसत्नतापूर्वक):-- पूर्वजो का अनुकरण करने वाले आप के लिये यह मुनिजनों की आज्ञा पालन करना अत्यन्त उचित है । निश्चय ही पुरुवंशी राजा विपत्तिग्रस्त व्यक्तियों के लिये अभयदानरूपी यज्ञ में (निर्भय बनाने मे) दीक्षित (हैं) ।
राजा:-- (प्रणामपूर्वक) आप दोनों आगे-आगे चलें । मैं पीछे-पीछे आ ही रहा हूँ । दोनों:-- आप की विजय हो । (दोनों निकल जाते हैं) । राजा:-- माधव्य, क्या (तुझमे) शकुन्तला को देखने का (कौतूहल) है ? विदूषक:-- पहले (शकुन्तला को देखने की उत्सुकता की) बाढ़ सी आयी हुई थी । किन्तु अब राक्षसो के समाचार से बूँद भर (अर्थात् थोड़ी) भी अवशिष्ट नहीं है । राजा:-- डरो मत । तुम मेरे समीप में रहोगे । विदूषक:-- तब तो मैं राक्षसों से सुरक्षित हो गया हूँ । द्वारपाल (प्रवेश कर):-- तैयार रथ महाराज के विजय-प्रस्थान की अपेक्षा (प्रतीक्षा) कर रहा है । परन्तु नगर से महारानी का सन्देशवाहक यह करभक आया हुआ है । राजा:-- (आदरपूर्वक) क्या माता जी के द्वारा भेजा गया है ? दवारपाल:-- ओर क्या । राजा:-- तो (उसे) प्रवेश कराओ। द्वारपाल:-- (जैसा आप कह रहे हैं) वैसा (करता हूँ) । (निकलकर पुनः करभक के साथ प्रवेश कर) ये महाराज हैं । (उनके) पास जाओ । करभक:-- जय हो, महाराज की जय हो । (पूज्य) महारानी आदेश दे रही हैं कि आगामी चौथे दिन मेरे उपवास की पारणा (उपवास की समाप्ति पर किया जाने वाला भोजन) होगी । उस अवसर पर चिरंजीवी (आप) के द्वारा (अपनी उपस्थिति से मुझे) अवश्य सम्मानित किया जाना चाहिये (अर्थात् उस अवसर पर आप अवश्य आकर मुझे सम्मानित करें) । राजा:-- इधर तपस्वियों का कार्य है और उधर गुरुजनों की आज्ञा । दोनों ही अनुल्लङ्कनीय हैं । यहाँ (ऐसी स्थिति में) क्या (उपाय) करना चाहिये ? विदूषक:-- त्रिशंकु की भाँति मध्य में लटके रहिये । राजा:-- सचमुच में व्याकुल हो गया हूँ । दोनों कार्यों (यज्ञरक्षा और माता के उपवास-पारण में सममिलित होने) के भिन्नभित्र (अलग-अलग) स्थानों में होने के कारण मेरा मन सामने (स्थित) पर्वत में टकराने वाले नदी-प्रवाह की भाँति दुविधा में पड़ गया है (दो तरफ बंट गया है) ।
(सोचकर) मित्र, (मेरी) माता के द्वारा तुम (भी) पुत्र की भाँति स्वीकार किये गये हो। (अर्थात् मेरी माता तुम्हें पुत्र की तरह मानती है) । इसलिये आप (तुम) यहाँ से लौटकर मुझको तपस्वियो के कार्य मे व्यस्त मन वाला बताकर पूज्य माता के पुत्र-कार्य को सम्पन्न कर देना । विदूषक:-- मुझको राक्षसों से भयभीत तो नहीं गिन रहे (समझ रहे) हो (जिससे मुझे राजधानी भेज रहे हो) । राजा:-- (मुस्कराकर) आप के विषय में यह कैसे सम्भव हो सकता है ? विदूषक:-- (तब तो) जिस प्रकार राजा के अनुज को जाना चाहिये उसी प्रकार जाऊंगा । राजा:-- निश्चय ही तपोवन की बाधा बचानी चाहिये (अर्थात् तपोवन में विध्न नहीं होना चाहिए), इसलिए सभी अनुयायियों को तुम्हारे साथ ही भेजता हूँ । विदूषक:-- (गर्व के साथ) तब तो अब मैं युवराज (राजकुमार) हो गया हूँ । राजा:-- (अपने मन में) यह ब्राह्मण-बालक चंचल है । कहीं (शकुन्तला विषयक) हमारी इच्छा (प्रार्थना) को अन्तःपुर की रानियों से (न) कह दे ! अच्छा, इससे इस प्रकार कहता हूँ । (विदूषक को हाथ से पकड़ कर प्रकट रूप से) मित्र, ऋषियों के महत्व (गौरव) के कारण आश्रम को जा रहा हूँ । वस्तुतः तापसकन्या (शकुन्तला) में मेरी इच्छा (आसक्ति) नही है । देखो मित्र, (भोग-विलास में आसक्त) हम लोग कहाँ ! और हरिण के बच्चों के साथ बढ़ा हुआ (पला हुआ), काम-वासना से अपरिचित (शकुन्तलारूपी) व्यक्ति कहाँ !! (अतः) हंसी (उपहास) मे कही गयी (मेरी) बात को सही रूप में न ग्रहण कर लेना (अर्थात् मेरी बात यथार्थ न समझ लेना) ।
विदूषक:-- ओर क्या ! (सभी निकल जाते हैं)
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