विदूषक:--
(क्रोधपूर्वक) अरे उत्साह दिलाने वाले, दूर हट । आदरणीय महाराज (अपनी) स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गये हैं । तू तो एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमता हआ मनुष्य की नाक के लालची किसी बूढ़े रीछ के मुंह में गिर पड़ेगा ।
राजा:--
भद्र सेनापति, (हम लोग) आश्रम के समीप रुके हैं । इस लिये तुम्हारे वचन का अभिनन्दन नहीं करता हूँ (अर्थात् तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ ।) आज तो भैंसे सीगों से पुनः पुनः उछाले गये तालाब के जल में स्नान करें । छाया में झुंड (कदम्बक) बनाकर स्थित मृगसमूह जुगाली का अभ्यास करें । सूअरों की पंक्तियां (सूकरसमूह) निर्भय होकर पोखरो (जंगली गड्डो) में नागरमोथा को उखाडे । यह हमारा धनुष भी शिथिल डोरी (प्रत्यञ्चा) वाला होकर विश्राम को प्राप्त करे ।
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