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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 6
विदूषकः- (सरोषम्‌) अपेहि रे उत्साहहेतुक । अत्रभवान्‌ प्रकृतिमापन्नः । त्व तावदटवीतोऽ टवीमादिण्डमानो नरनासिकालोलुपस्य जीर्णऋक्षस्य कस्यापि मुखे पतिष्यसि । राजा- भद्र सेनापते, आश्रमसत्निकष्टे स्थिताः स्मः । अतस्ते वचो नाभिनन्दामि । अद्य तावत्‌- गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शदधर्मुहुस्ताडितं छायाबद्धकदम्बक मृगकुलं रोमन्थमभ्यस्यतु । विश्रब्धं ॒ क्रियतां वराहततिभिर्मुस्ताक्षतिः पल्वले विश्रामं . लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मदधनुः ।। ० |
विदूषक:-- (क्रोधपूर्वक) अरे उत्साह दिलाने वाले, दूर हट । आदरणीय महाराज (अपनी) स्वाभाविक अवस्था को प्राप्त हो गये हैं । तू तो एक जंगल से दूसरे जंगल में घूमता हआ मनुष्य की नाक के लालची किसी बूढ़े रीछ के मुंह में गिर पड़ेगा । राजा:-- भद्र सेनापति, (हम लोग) आश्रम के समीप रुके हैं । इस लिये तुम्हारे वचन का अभिनन्दन नहीं करता हूँ (अर्थात्‌ तुम्हारी बात नहीं मानता हूँ ।) आज तो भैंसे सीगों से पुनः पुनः उछाले गये तालाब के जल में स्नान करें । छाया में झुंड (कदम्बक) बनाकर स्थित मृगसमूह जुगाली का अभ्यास करें । सूअरों की पंक्तियां (सूकरसमूह) निर्भय होकर पोखरो (जंगली गड्डो) में नागरमोथा को उखाडे । यह हमारा धनुष भी शिथिल डोरी (प्रत्यञ्चा) वाला होकर विश्राम को प्राप्त करे ।
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