विदूषक:--
(राजा के मुख को देखकर) आदरणीय ! आप कुछ मन में रख कर विचार कर रहे हैं । (लगता है) मेरे द्वारा अरण्यरोदन (ही) किया गया (अर्थात् मैने व्यर्थ ही आप से विश्राम करने के लिए प्रार्थना की) |
राजा:--
(मुस्कराहट के साथ) (मन में) दूसरा क्या (विचार करुंगा) । मेरे लिये (अपने) मित्र का वचन अनुल्लद्धनीय है (अर्थात् मैं मित्र के वचन का उलंघन नहीं कर सकता हूँ) । इसीलिये (शिकार खेलने से) विरत हो गया हूँ ।
विदूषक:--
आप चिरंजीवी हों । (जाना चाहता है)
राजा:--
हे मित्र, रुको । (अभी) मेरी बात अधूरी ही है ।
विदूषक:--
आप आज्ञा दीजिये ।
राजा:--
विश्रान्त होने पर (विश्राम के बाद) आप को मेरे भी एक सरल (सुसाध्य) कार्य में सहायक होना है ।
विदूषक:--
क्या लड्डू तोडने (खाने) में ? तो यह सुअवसर (निमंत्रण) शिरोधार्य (सहर्ष स्वीकार) है ।
राजा:--
जहां (अर्थात् जिस कार्य के विषय में) मैं कहूंगा (उसमे आपको मेरी सहायता करनी है) । अरे; कौन (है), कौन (है) यहाँ ?
दारपाल (प्रवेश करके):--
(प्रणाम करके) स्वामी आज्ञा दें ।
राजा:--
रैवतक, सेनापति को बुलाओ ।
द्वारपाल:--
(ठीक है, मैं) वैसा (ही करता हूँ ) । (निकल कर सेनापति के साथ फिर प्रवेश कर) आज्ञा देने के लिए उत्कण्ठित ये स्वामी इधर ही दत्तदृष्टि (आंख लगाये हुये) बेठे हैं । आप (उनके) समीप चलें ।
सेनापति:--
(राजा को देखकर) दोषग्रस्त मृगया (शिकार) भी महाराज के लिये केवल गुण (स्वरूप) ही हो गयी है । क्योकि महाराज पर्वत पर विचरण करने वाले हाथी की भाँति (महाराज) निरन्तर धनुष की डोरी (प्रत्यञ्चा) के खींचने से कठोर अग्रभाग वाले (अर्थात् जिसका अगला भाग धनुष की डोरी खींचने से कठोर हो गया हो ऐसे), सूर्य के ताप को सहन कर लेने वाले (अर्थात् जो सूर्य की किरणों को सहन कर लेने वाला है ऐसे), पसीने की बंद से रहित तथा कृश होते हुए भी विशालता (अर्थात् लम्बा-चोडा होने) के कारण (कृश) न दिखायी पड़ने वाले, अत्यन्त बल से युक्त शरीर को धारण करते हैं ।
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