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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 4
विदूषकः-- (राज्ञो मुखं विलोक्य) अत्रभवान्‌ किमपि हदये कृत्वा म्रयते । अरण्ये मया रुदितमासीत्‌ । राजा-- (सस्मितम्‌) किमन्यत्‌ । अनतिक्रमणीयं मे सुहदवाक्यमिति स्थितोऽस्मि । विदूषकः--चिरंजीव । (चिरं जीअ) (इति गन्तुमिच्छति) । राजा-- वयस्य, तिष्ठ । सावशेषं मे वचः । विदूषकः-- आज्ञापयतु भवान्‌ । राजा-- विश्रान्तेन भवता ममाप्येकस्मिन्ननायासे कर्मणि सहायेन भवितव्यम्‌ । विदूषकः-- कि मोद्कखण्डिकायाम्‌ ? तेन ह्ययं सुगृहीतः क्षणः । राजा-- यत्र वश््यामि । कः कोऽत्र भोः? (प्रविश्य) दौवारिकः--(प्रणम्य) अज्ञापयतु भर्ता । (आणवेदु भा) । राजा- रैवतक, सेनापतिस्तावदाहूयताम्‌ । दोवारिकः- तथा । (इति निष्क्रम्य सेनापतिना सह पुनः प्रविश्य) एष आज्ञावचनोत्कण्ठो भर्तेतो दत्तदृष्टिरेव तिष्ठति । उपसर्पत्वार्यः । सेनापतिः- (राजानमवलोक्य) दृष्टदोषापि स्वामिनि मृगया केवलं गुण एव संवृत्ता । तथा हि देवः-- अनवरतधनुज्यस्फालनक्रूरपूर्व रविकिरणसहिष्णु स्वेदलेशौरभिन्नम्‌ । अपचितमपि गात्रं व्यायतत्वादलक्ष्यं गिरिचर इव नागः प्राणसारं बिभर्ति।।
विदूषक:-- (राजा के मुख को देखकर) आदरणीय ! आप कुछ मन में रख कर विचार कर रहे हैं । (लगता है) मेरे द्वारा अरण्यरोदन (ही) किया गया (अर्थात्‌ मैने व्यर्थ ही आप से विश्राम करने के लिए प्रार्थना की) | राजा:-- (मुस्कराहट के साथ) (मन में) दूसरा क्या (विचार करुंगा) । मेरे लिये (अपने) मित्र का वचन अनुल्लद्धनीय है (अर्थात्‌ मैं मित्र के वचन का उलंघन नहीं कर सकता हूँ) । इसीलिये (शिकार खेलने से) विरत हो गया हूँ । विदूषक:-- आप चिरंजीवी हों । (जाना चाहता है) राजा:-- हे मित्र, रुको । (अभी) मेरी बात अधूरी ही है । विदूषक:-- आप आज्ञा दीजिये । राजा:-- विश्रान्त होने पर (विश्राम के बाद) आप को मेरे भी एक सरल (सुसाध्य) कार्य में सहायक होना है । विदूषक:-- क्या लड्डू तोडने (खाने) में ? तो यह सुअवसर (निमंत्रण) शिरोधार्य (सहर्ष स्वीकार) है । राजा:-- जहां (अर्थात्‌ जिस कार्य के विषय में) मैं कहूंगा (उसमे आपको मेरी सहायता करनी है) । अरे; कौन (है), कौन (है) यहाँ ? दारपाल (प्रवेश करके):-- (प्रणाम करके) स्वामी आज्ञा दें । राजा:-- रैवतक, सेनापति को बुलाओ । द्वारपाल:-- (ठीक है, मैं) वैसा (ही करता हूँ ) । (निकल कर सेनापति के साथ फिर प्रवेश कर) आज्ञा देने के लिए उत्कण्ठित ये स्वामी इधर ही दत्तदृष्टि (आंख लगाये हुये) बेठे हैं । आप (उनके) समीप चलें । सेनापति:-- (राजा को देखकर) दोषग्रस्त मृगया (शिकार) भी महाराज के लिये केवल गुण (स्वरूप) ही हो गयी है । क्योकि महाराज पर्वत पर विचरण करने वाले हाथी की भाँति (महाराज) निरन्तर धनुष की डोरी (प्रत्यञ्चा) के खींचने से कठोर अग्रभाग वाले (अर्थात्‌ जिसका अगला भाग धनुष की डोरी खींचने से कठोर हो गया हो ऐसे), सूर्य के ताप को सहन कर लेने वाले (अर्थात्‌ जो सूर्य की किरणों को सहन कर लेने वाला है ऐसे), पसीने की बंद से रहित तथा कृश होते हुए भी विशालता (अर्थात्‌ लम्बा-चोडा होने) के कारण (कृश) न दिखायी पड़ने वाले, अत्यन्त बल से युक्त शरीर को धारण करते हैं ।
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