दोनों—
(समीप जाकर) राजन्, आपकी विजय हो।
राजा—
(आसन से उठकर) आप दोनों को प्रणाम करता हूँ।
दोनों—
आप का कल्याण हो। (फलों को देते हैं)राजा—
(प्रणाम पूर्वक स्वीकार कर)(आप लोगों से) आज्ञा देने की इच्छा करता हूँ (अर्थात् आप लोग आज्ञा दें, क्या कार्य है)।
दोनों—
आप यहाँ हैं, (यह) आश्रमवासियों को ज्ञात हो गया है।
अतः वे आपसे प्रार्थना करते हैं।
राजा—
वे क्या आज्ञा देते हैं?
दोनों—
पूज्य महर्षि कण्व की असमीपस्थता (अनुपस्थिति) के कारण राक्षस हमारे यज्ञ में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं।
इसलिए कुछ रात्रि (अर्थात् कुछ दिन) सारथि के साथ (रहकर) आश्रम को सनाथ कीजिये (अर्थात् आश्रम की रक्षा कीजिये)।
राजा—
मैं अनुगृहीत हूँ।
विदूषक—
(एक ओर होकर) यह प्रार्थना अब (तो) आप के अनुकूल (ही) है।
राजा—
(मुस्कुरा कर) रैवतक, मेरे आदेश से सारथि से कहो 'धनुष' के साथ (मेरा) रथ उपस्थित करो।
दवारपाल—
जो महाराज आज्ञा दे रहे हैं (वहीं करूंगा)।
(निकल जाता है)दोनों(प्रसत्नतापूर्वक)—
पूर्वजो का अनुकरण करने वाले आप के लिये यह मुनिजनों की आज्ञा पालन करना अत्यन्त उचित है।
निश्चय ही पुरुवंशी राजा विपत्तिग्रस्त व्यक्तियों के लिये अभयदानरूपी यज्ञ में (निर्भय बनाने मे) दीक्षित (हैं)।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।