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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 2 • श्लोक 16
उभौ- (उपगम्य) विजयस्व राजन्‌ । राजा--(आसनादुत्थाय) अभिवादये भवन्तौ । उभौ- स्वस्ति भवते । (इति फलान्युपहरतः) । राजा-(सप्रणामम्‌ परिगृह्य) आज्ञापयितुमिच्छामि । उभौ-- विदितो भवानाश्रमसदामिहस्थः । तेन भवन्तं प्रार्थयन्ते । राजा--किमाज्ञापयान्ति ? उभौ- तत्रभवतः कण्वस्य महर्षेरसाननिध्याद्‌ रक्षासि न इष्टिविध्नमुत्पादयन्ति । तत्‌ कतिपयरात्रं सारथिद्वितीयेन भवता सनाथीक्रियतामाश्रम इति । राजा--अनुगृहीतोऽस्मि । विदूषकः- (अपवार्य) एषेदानीमनुकूला तेऽभ्यर्थना । राजा- (स्मितं कृत्वा) रैवतक, मद्वचनादुच्यतां सारथिः, सबाणासनं रथमुपस्थापयेति । दौवारिकः-- यद्‌ देव आज्ञापयति । (जं देवो आणवेदि ।) (इति निष्क्रान्तः) । उभौ-(सहर्षम्‌)- अनुकारिणि पूर्वेषां युक्तरूपमिदं त्वयि । आपन्नाभयसत्रेषु दीक्षिताः खलु पौरवाः ।।
दोनों:-- (समीप जाकर) राजन्‌ , आपकी विजय हो । राजा:-- (आसन से उठकर) आप दोनों को प्रणाम करता हूँ । दोनों:-- आप का कल्याण हो। (फलों को देते हैं) । राजा:-- (प्रणाम पूर्वक स्वीकार कर) (आप लोगों से) आज्ञा देने की इच्छा करता हूँ (अर्थात्‌ आप लोग आज्ञा दें, क्या कार्य है) । दोनों:-- आप यहाँ हैं, (यह) आश्रमवासियों को ज्ञात हो गया है । अतः वे आपसे प्रार्थना करते हैं । राजा:-- वे क्या आज्ञा देते हैं ? दोनों:-- पूज्य महर्षि कण्व की असमीपस्थता (अनुपस्थिति) के कारण राक्षस हमारे यज्ञ में विघ्न उत्पन्न कर रहे हैं । इसलिए कुछ रात्रि (अर्थात्‌ कुछ दिन) सारथि के साथ (रहकर) आश्रम को सनाथ कीजिये (अर्थात्‌ आश्रम की रक्षा कीजिये) । राजा:-- मैं अनुगृहीत हूँ । विदूषक:-- (एक ओर होकर) यह प्रार्थना अब (तो) आप के अनुकूल (ही) है । राजा:-- (मुस्कुरा कर) रैवतक, मेरे आदेश से सारथि से कहो 'धनुष' के साथ (मेरा) रथ उपस्थित करो । दवारपाल:-- जो महाराज आज्ञा दे रहे हैं (वहीं करूंगा) । (निकल जाता है) । दोनों (प्रसत्नतापूर्वक):-- पूर्वजो का अनुकरण करने वाले आप के लिये यह मुनिजनों की आज्ञा पालन करना अत्यन्त उचित है । निश्चय ही पुरुवंशी राजा विपत्तिग्रस्त व्यक्तियों के लिये अभयदानरूपी यज्ञ में (निर्भय बनाने मे) दीक्षित (हैं) ।
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