विदूषक- न खलु दृष्टमात्रस्य तवाङ्कं समारोहति ।
राजा- मिथः प्रस्थाने पुनः शालीनतयाऽपि काममविष्कृतो भावस्तत्रभवत्या । तथा हि--
दभङ्कुरिण चरणः क्षत इत्यकाण्डे तन्वी स्थितां कतिचिदेव पदानि गत्वा । आसीद् विवृत्तवदना च विमोचयन्ती शाखासु वल्कलमसक्तमपि द्रुमाणाम् ।।
विदूषक:--
तो (क्या) देखते हो तुम्हारी गोद में नहीं बैठ जाती ?
राजा:--
(सखियों के) साथ प्रस्थान करते समय उस (शकुन्तला) के द्वारा शालीनता से भी (मेरे प्रति) भली-भाँति प्रेम-भाव प्रकट (आविष्कृत) कर दिया गया । क्योकि (वह) कृशाङ्गी (पतले शरीर वाली) (शकुन्तला) कुछ ही पग चलकर अकारण (अवसर न होने पर) भी कुश के अङ्कुर (नोक) से (मेरा) पैर क्षत (घायल) हो गया है यह कहकर खड़ी हो गयी (रुक गयी) और वृक्षो की शाखाओं (टहनियो) मे न फंसे हुए भी वत्कल वस्त्र को छुडाती हुई (मेरी ओर) मुंह घुमाकर खड़ी हो गयी ।
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